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धौलपुर, Jun 03, 2026

Dholpur: गोचर भूमि सिमटी तो बढ़ा पशु संकट…कहां मिले हरा चारा

dholpur, मनियां क्षेत्र में घटती गोचर भूमि अब केवल राजस्व या अतिक्रमण का मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि यह पशुपालन और गोवंश संरक्षण से जुड़ा गंभीर विषय बनता जा रहा है। चारागाह भूमि पर अतिक्रमण, विभिन्न निर्माण कार्यों और बढ़ते दबाव के कारण पशुओं के चरने की जगह लगातार कम हो रही है।

Dholpur news

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dholpur, मनियां क्षेत्र में घटती गोचर भूमि अब केवल राजस्व या अतिक्रमण का मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि यह पशुपालन और गोवंश संरक्षण से जुड़ा गंभीर विषय बनता जा रहा है। चारागाह भूमि पर अतिक्रमण, विभिन्न निर्माण कार्यों और बढ़ते दबाव के कारण पशुओं के चरने की जगह लगातार कम हो रही है। इसका असर न केवल पशुपालकों पर पड़ रहा है, बल्कि निराश्रित गोवंश के जीवन पर भी दिखाई देने लगा है।

ग्रामीणों और पशुपालकों का कहना है कि पहले गांवों के आसपास पर्याप्त गोचर भूमि होने से पशुओं को प्राकृतिक रूप से चारा मिल जाता था। अब चराई क्षेत्र घटने से पशुओं के लिए हरे चारे का संकट खड़ा हो गया है। मजबूरी में पशुपालकों को महंगा भूसा खरीदकर पशुओं का पालन करना पड़ रहा है।स्थिति यह है कि कुछ वर्ष पहले 400 से 500 रुपए प्रति मन मिलने वाला भूसा अब 1200 से 1500 रुपए प्रति मन तक पहुंच गया है। चारे की बढ़ती लागत के कारण कई पशुपालक पशुओं की संख्या कम कर रहे हैं और नए पशु खरीदने से भी बच रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पशुपालन अब पहले की तुलना में कहीं अधिक खर्चीला हो गया है।

सबसे ज्यादा प्रभावित निराश्रित गोवंश हो रहा है। चरने के लिए पर्याप्त गोचर भूमि नहीं होने के कारण बड़ी संख्या में गाय और अन्य पशु गांवों व कस्बों की सडक़ों पर भटकते रहते हैं। भोजन की तलाश में ये पशु कचरे के ढेरों तक पहुंच जाते हैं और प्लास्टिक तथा अन्य हानिकारक सामग्री खा लेते हैं। पशु चिकित्सकों के अनुसार प्लास्टिक खाने से कई पशु गंभीर रूप से बीमार हो जाते हैं और अनेक मामलों में उनकी मौत तक हो जाती है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि गोचर भूमि का संरक्षण किया जाए और अतिक्रमण हटाकर उसे पशुओं के लिए उपलब्ध कराया जाए तो आवारा गोवंश को प्राकृतिक चारा मिल सकेगा। इससे सडक़ हादसों में कमी आने के साथ पशुओं की सेहत भी बेहतर होगी।

राजस्व विभाग के आंकड़ों के अनुसार क्षेत्र में गोचर भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने की कार्रवाई जारी है, लेकिन पशुपालकों का मानना है कि शेष भूमि को भी जल्द मुक्त कराया जाना जरूरी है ताकि भविष्य में चारे का संकट और गहरा न हो।

गोचर भूमि घटी, सडक़ों पर बढ़ा गोवंश

ग्रामीण क्षेत्र में चरने के लिए पर्याप्त भूमि नहीं होने से बड़ी संख्या में निराश्रित गाय और अन्य पशु कस्बों व शहरों की सडक़ों पर भटक रहे हैं। भोजन की तलाश में ये पशु कचरे के ढेरों तक पहुंच जाते हैं, जिससे दुर्घटनाओं और बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। वहीं, पशु चिकित्सकों के अनुसार कचरे में पड़ी प्लास्टिक खाने से पशुओं के पेट में गंभीर समस्याएं हो जाती हैं। कई मामलों में ऑपरेशन की नौबत आती है, जबकि अनेक पशुओं की मौत भी हो जाती है।

तीन गुना महंगा हुआ भूसा

पशुपालकों के अनुसार पहले 400 से 500 रुपए प्रति मन मिलने वाला भूसा अब 1200 से 1500 रुपए प्रति मन तक पहुंच गया है। बढ़ती कीमतों ने पशुपालन को घाटे का सौदा बना दिया है।

55.04 हेक्टेयर भूमि हुई अतिक्रमण मुक्त

जिले के मनियां इलाके में राजस्व विभाग ने 227 प्रकरणों में कार्रवाई करते हुए 55.04 हेक्टेयर गोचर भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया है। प्रशासन का दावा है कि अभियान आगे भी जारी रहेगा। उक्त भूमि पर लम्बे समय से कब्जा कर रखा था। प्रशासन ने सख्ती दिखाई तो भूमि मुक्त हो पाई।

क्षेत्र में प्रतिदिन 15 से 20 पशुओं की ओपीडी रहती है। पर्याप्त चारा नहीं मिलने और कचरा खाने के कारण कई पशुओं में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं सामने आती हैं। गोचर भूमि की उपलब्धता पशुओं के स्वास्थ्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

-डॉ. दीपक शर्मा, पशु स्वास्थ्य अधिकारी

गोचर भूमि पर अतिक्रमण हटाने के लिए लगातार अभियान चलाया जा रहा है। अब तक 227 प्रकरणों में कार्रवाई करते हुए 55.04 हेक्टेयर भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया गया है। शेष मामलों में भी नियमानुसार कार्रवाई जारी है।

-जगवीर सिंह बेनीवाल, तहसीलदार मनियां

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