
शंकराचार्य विवाद के बीच बद्रीनाथ से संदेश | Image - X/@jyotirmathah
Avimukteshwaranand Shankaracharya: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उत्तराखंड स्थित बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले होने वाली सबसे अहम और पवित्र परंपरा, गाड़ू घड़ा यात्रा, में बतौर ‘शंकराचार्य’ शामिल होने का औपचारिक निमंत्रण भेजा गया है। यह न्योता ऐसे समय पर सामने आया है, जब उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य पद को लेकर विवाद गहराया हुआ है और प्रयागराज माघ मेला प्रशासन व स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है।
प्रयागराज माघ मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से शंकराचार्य होने से जुड़े प्रमाण मांगे थे। इस पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासन को अपना जवाब सौंपा, लेकिन इसके बाद उन्होंने मेला क्षेत्र छोड़कर काशी का रुख कर लिया। यह मामला राजनीतिक और धार्मिक दोनों ही स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया, जिससे पूरे घटनाक्रम को लेकर देशभर में प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं।
विवाद उस समय और तेज हो गया, जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हिंदू होने का प्रमाण मांगा। उन्होंने इसके लिए 40 दिन का समय निर्धारित किया। इस बयान के बाद मामला केवल धार्मिक बहस तक सीमित न रहकर राजनीतिक विमर्श का भी हिस्सा बन गया, जिससे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड दोनों राज्यों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया।
श्री बद्रीनाथ डिमरी धार्मिक केंद्रीय पंचायत के अध्यक्ष पंडित आशुतोष डिमरी ने बताया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को यह न्योता 25 जनवरी को भेजा गया था। आमंत्रण पत्र में उनसे ऋषिकेश से बद्रीनाथ धाम तक निकलने वाली पवित्र गाड़ू घड़ा यात्रा में भाग लेने की अपील की गई है। यह यात्रा बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले निभाई जाने वाली सबसे प्रमुख धार्मिक परंपराओं में गिनी जाती है।
गाड़ू घड़ा यात्रा केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि चारधाम यात्रा की औपचारिक शुरुआत का प्रतीक मानी जाती है। इसी यात्रा के माध्यम से भगवान बद्री विशाल के अभिषेक और अखंड ज्योति के लिए इस्तेमाल होने वाला पवित्र तिल का तेल बद्रीनाथ धाम तक पहुंचाया जाता है। कपाट खुलने के दिन इसी तेल से भगवान बद्री विशाल का विधिवत अभिषेक किया जाता है।
इस यात्रा की शुरुआत टिहरी जिले के नरेंद्र नगर स्थित राजमहल से होती है। यहां डिमरी समुदाय की सुहागिन महिलाएं व्रत रखकर पारंपरिक विधि से तिल का तेल निकालती हैं। इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की मशीन का इस्तेमाल नहीं किया जाता, ताकि शुद्धता और धार्मिक मर्यादा बनी रहे। महिलाएं मुंह पर पीला कपड़ा बांधकर सिलबट्टा, ओखली और हाथों की मदद से तेल तैयार करती हैं।
तैयार किए गए तिल के तेल को चांदी के विशेष कलश में भरा जाता है, जिसे ‘गाड़ू घड़ा’ कहा जाता है। इसके बाद डिमरी पुजारी समुदाय की अगुवाई में इस कलश को सजे-धजे रथ पर रखकर यात्रा की शुरुआत होती है। यह यात्रा विभिन्न धार्मिक पड़ावों से गुजरते हुए बद्रीनाथ धाम तक पहुंचती है, जहां कपाट खुलने के दिन इसी पवित्र तेल से भगवान बद्री विशाल का अभिषेक किया जाता है।
‘श्री बद्रीनाथ डिमरी धार्मिक केंद्रीय पंचायत’ बद्रीनाथ धाम से जुड़े डिमरी पुजारी समुदाय की एक प्रमुख संस्था है। इस पंचायत में डिम्मर गांव के ब्राह्मण पुजारी शामिल होते हैं, जो धार्मिक आयोजन, रस्म-रिवाज और पूजा से जुड़े अहम निर्णय सामूहिक रूप से लेते हैं। कपाट खुलने की तिथि, तेल कलश यात्रा और अन्य प्रमुख धार्मिक अनुष्ठानों में इस संस्था की केंद्रीय भूमिका मानी जाती है।
ऐसे समय में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को बद्रीनाथ धाम से बतौर शंकराचार्य आमंत्रित किया जाना केवल एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं माना जा रहा है। इसे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के बीच चल रहे धार्मिक और प्रशासनिक विवाद के संदर्भ में एक बड़े संकेत के रूप में देखा जा रहा है, जिसने इस पूरे प्रकरण को राष्ट्रीय स्तर की बहस का विषय बना दिया है।
Published on:
31 Jan 2026 06:17 pm

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