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चित्तौड़गढ़, Jun 05, 2026

Chittorgarh: फौजी की मां का जज्बा; 85 की उम्र में नंगे पैर लाठी के सहारे सींच रही स्कूल का ‘स्मृति वन’

World Environment Day Special: पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए कोई किस हद तक जा सकता है, इसकी जीती-जागती बानगी चित्तौड़गढ़ जिले में बड़ी सादड़ी उपखंड क्षेत्र लुहारिया गांव के सरकारी स्कूल के खेल मैदान में विकसित उपवन में देखने को मिली है।

eco warrior grandmother

photo: patrika

World Environment Day Special: पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए कोई किस हद तक जा सकता है, इसकी जीती-जागती बानगी चित्तौड़गढ़ जिले में बड़ी सादड़ी उपखंड क्षेत्र लुहारिया गांव के सरकारी स्कूल के खेल मैदान में विकसित उपवन में देखने को मिली है। एक ओर जहां आसमान से 45 डिग्री की आग बरस रही है, वहीं 85 वर्ष की एक बुजुर्ग महिला अपनी शारीरिक क्षमता से कहीं अधिक हौसले के साथ इस उपवन को हरा-भरा बनाए रखने के लिए प्राण-प्रण से जुटी हैं।

यह कहानी है गांव की कन्नी बाई पत्नी स्वर्गीय नारायण सिंह मीणा की, जो नंगे पैर हाथ में लाठी और बाल्टी थामे स्कूल के 'स्मृति वन' में लगे एक-एक पौधे की ममता से सार-संभाल कर रही हैं। चारदीवारी के मध्य लगे 150 से अधिक विभिन्न प्रजातियों के इन पौधों को विद्यालय के शिक्षकों और कन्नी बाई ने मिलकर रोपा था, जो अब पेड़ का रूप ले रहे हैं।

कम उम्र में वैधव्य, संघर्षों से तपा जीवन

कन्नी बाई का जीवन बेहद संघर्षपूर्ण रहा है। जब वे बहुत कम उम्र की थीं, तभी उनके पति नारायण सिंह का स्वर्गवास हो गया था। उस कठिन दौर में उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और बेहद मुश्किल हालातों का सामना करते हुए अपनी तीन बेटियों और एक इकलौते बेटे का अकेले ही पालन-पोषण किया। आज जीवन के इस पड़ाव पर भी उनका हौसला और कर्मठता युवाओं को प्रेरणा देने वाली है।

एक हाथ में लाठी, दूसरे में बाल्टी

स्कूल में वर्तमान में न तो कोई चौकीदार है और न ही चपरासी। ऐसे में पौधों को बचाने की पूरी जिम्मेदारी 85 साल की इस बुजुर्ग ने अपने कंधों पर उठा ली है। कन्नी बाई रोज समय पर एक हाथ में लाठी और दूसरे हाथ में बाल्टी लेकर पौधों को पानी देने पहुंचती हैं। यदि कोई पौधा सूख जाए, तो वे हाथों-हाथ उसकी जगह दूसरा नया पौधा लगा देती हैं और सुरक्षा के लिए लगाए गए ट्री-गार्ड को भी दुरुस्त करती हैं।

स्कूल में पानी नहीं, खुद के कुएं से बिछाई पाइपलाइन

संसाधनों की कमी भी कन्नी बाई के आड़े नहीं आई। स्कूल में पानी की कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण उन्होंने अनोखा रास्ता निकाला। चूंकि उनका खेत स्कूल की दीवार से बिल्कुल सटा हुआ है, इसलिए उन्होंने अपने निजी नलकूप (ट्यूबवेल) से पाइपलाइन जोड़कर स्कूल के पौधों के लिए पानी का इंतजाम कर दिया। वे इसी पानी से पूरे उपवन को सींचती हैं।

स्वयं निरक्षर, बेटा सेना में सूबेदार

कन्नी बाई स्वयं भले ही अनपढ़ हैं, लेकिन उन्होंने अपने इकलौते पुत्र रामेश्वर मीणा को देश सेवा के लिए भारतीय सेना में भेजा, जो हाल ही में सूबेदार के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। अपनी इसी सादगी और फौजी बेटे की बदौलत वे हवाई जहाज से भी यात्रा कर चुकी हैं, लेकिन अपनी माटी से उनका जुड़ाव आज भी अटूट है।

धीरे-धीरे आकार ले रहा है 'स्मृति वन'

स्कूल के प्रधानाध्यापक हेमेंद्र जानी, पर्यावरण प्रभारी वार्षिका सारंगदेवोत और अनिल मीणा ने ग्रामीणों के साथ मिलकर इस उपवन में आम, जामुन, बिल्वपत्र, पीपल, वट और आंवला सहित कई छायादार व फलदार पौधे लगाए हैं। कन्नी बाई की देखरेख में अब यहां तरह-तरह के फूल भी खिल रहे हैं, जो स्कूल की सुंदरता बढ़ा रहे हैं।

अधिकारी ये बोले…

लुहारिया का स्कूल वास्तविक पर्यावरण की पहचान है। नियमानुसार उच्च प्राथमिक विद्यालय में चौकीदार अथवा चतुर्थ श्रेणी कार्मिक का प्रावधान नहीं होता है। वर्तमान में इस विद्यालय में 7 स्वीकृत पदों के मुकाबले 3 शिक्षक कार्यरत हैं। आगामी सत्र में यहां शिक्षकों की उचित व्यवस्था कर दी जाएगी। - जगदीश चन्द्र धाकड़, एसीबीईओ, बड़ीसादड़ी

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