
छोटे और बड़े शहरों के अपने-अपने फायदे-नुकसान हैं। (PC: AI)
Work Life Balance: आपके लिए क्या मायने रखता है? ज्यादा पैसा या माता-पिता के साथ रहने का कंफर्ट। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट वायरल है, जिसने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर फाइनेंशियल इन्फ्लुएंसर नेहा नागर की एक पोस्ट ने लाइफ और करियर से जुड़े फैसलों पर बड़ी बहस छेड़ दी है। उन्होंने पोस्ट में पूछा कि टियर-2 सिटीज में माता-पिता के साथ रहते हुए महीने के एक लाख रुपये कमाना बेहतर है या किसी मेट्रो सिटी में अकेले रहते हुए 2.5 लाख रुपये महीना कमाना। यह पोस्ट तेजी से वायरल हुई और सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो गई। इस पोस्ट पर सैकड़ों यूजर्स ने अपनी राय दी। कुछ यूजर्स ने फैमिली के साथ रहने को प्रायोरिटी दी। जबकि कई यूजर्स ने फ्रीडम, करियर ग्रोथ और बड़े शहरों में बेहतर अवसरों पर जोर दिया।
एक यूजर ने लिखा, “टियर-2 शहरों में परिवार के साथ रहना फैमिली पॉलिटिक्स और पड़ोसियों की अपेक्षाओं के दबाव से भरा होता है। उधर मेट्रो सिटी की जिंदगी की बात करें तो… साफ हवा तक नहीं है!! दोनों ही तरफ आदमी फंसा हुआ है, सोल्यूशन आउट ऑफ द बॉक्स है, जिसमें हम कैद हैं!!” इस कमेंट को काफी लाइक्स मिले हैं, जिससे साफ है कि लोग इस दुविधा से कितना जुड़ाव महसूस कर रहे हैं।
कई यूजर्स का मानना था कि कॉरपोरेट भागदौड़ के चक्कर में परिवार के साथ बिताए जाने वाले अहम पल गंवाना सही नहीं है। एक यूजर ने कहा, “मैं फिर भी कम इनकम और माता-पिता के साथ रहना ही चुनूंगा। शहर इंतजार कर सकते हैं, प्रमोशंस इंतजार कर सकते हैं। लेकिन माता-पिता हर दिन बूढ़े हो रहे हैं। घर लौटकर उनकी मौजूदगी, उनका ख्याल, उनकी खामोशी… यह अनमोल है।”
वहीं दूसरी तरफ, कई लोगों का मानना था कि असली करियर ग्रोथ मेट्रो शहरों के ‘हसल कल्चर’ से ही मिलती है। एक कमेंट में लिखा गया, “मैं मेट्रो में 2.5 लाख रुपये चुनूंगा। ज्यादा सैलरी, बेहतर एक्सपोजर और बड़ा नेटवर्क। अकेले रहना आपको व्यक्तिगत और पेशेवर तौर पर तेजी से आगे बढ़ने के लिए मजबूर करता है।”
एक यूजर ने इस बहस को साधारण गणित में समझाया। उसके मुताबिक, टियर-2 शहर में बिना किराए के 1 लाख रुपये कमाने वाला व्यक्ति हर महीने 60,000 से 70,000 रुपये बचा सकता है। वहीं, मेट्रो में 2.5 लाख रुपये कमाने वाला व्यक्ति, किराया और लाइफस्टाइल खर्चों के बाद, करीब 80,000 से 90,000 रुपये ही बचा पाएगा। 12% रिटर्न के साथ 10 साल में दोनों के कॉर्पस में फर्क सिर्फ 30–40 लाख रुपये का होगा। यूजर का तर्क था कि यह अंतर जीवन बदल देने वाला नहीं है। उसने लिखा, “असली सवाल यह है कि कौन सा विकल्प आपको बिना थके लगातार निवेश करने देता है? संपत्ति अनुशासन से बनती है, सिर्फ ज्यादा सैलरी से नहीं।”
एक अन्य यूजर ने कहा कि मेट्रो शहर में 2.5 लाख रुपये की सैलरी भले ही ज्यादा खर्चों के साथ आती हो, लेकिन यह स्वतंत्रता और मजबूत प्रोफेशनल नेटवर्क बनाती है। यूजर ने लिखा, “ये फायदे समय के साथ कंपाउंड होते जाते हैं।” कई यूजर्स ने यह भी कहा कि यह चुनाव इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति के लिए “वेल्थ क्रिएशन” का मतलब क्या है। एक यूजर ने लिखा कि अगर वेल्थ का मतलब सिर्फ पैसा और मजबूत रिटायरमेंट फंड है, तो मेट्रो शहर सही है। लेकिन अगर वेल्थ का मतलब अच्छी जिंदगी और खुशी है, तो लोग टियर-2 और टियर-3 शहरों में ही रहना पसंद करेंगे।
एक अलग नजरिया रखते हुए एक अन्य यूजर ने कहा कि टियर-2 शहर में बिना किराए के 1 लाख रुपये कमाने वाला व्यक्ति, मेट्रो में 2.5 लाख कमाने वाले से व्यवहारिक रूप से ज्यादा अमीर हो सकता है। उसने लिखा, “किराया, टैक्स और खर्चों के बाद मेट्रो में कमाने वाले अक्सर कम बचत कर पाते हैं। असली वेल्थ वह है जो आप बचाते हैं, न कि वह जो आप कमाते हैं।”
पोस्ट पर आए कमेंट्स का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर सहमत था कि भारत में छोटे शहर में 1 लाख रुपये महीने की कमाई आरामदायक जीवन के लिए पर्याप्त है। कई लोगों ने परिवार के साथ रहने के भावनात्मक सहारे और कम खर्चों जैसे फायदों को भी रेखांकित किया।
Published on:
13 Jan 2026 04:34 pm
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