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मुकेश अंबानी के ग्रीन एनर्जी ड्रीम पर ब्रेक; चीन का टेक्नोलॉजी देने से इनकार, लीथियम-आयन बैटरी सेल योजना रोकी

रिलायंस ने इस साल सेल निर्माण शुरू करने का लक्ष्य रखा था। अगस्त में, मुकेश अंबानी ने शेयरधारकों को बताया था कि रिलायंस की बैटरी गीगाफैक्ट्री 2026 में शुरू हो जाएगी।

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भारत का लक्ष्य 2070 तक कार्बन-जीरो बनने का है (PC: IANS)

मुकेश अंबानी (Mukesh Ambani) की रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) ने भारत में लीथियम-आयन बैटरी सेल बनाने की योजनाओं को फिलहाल के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया है, क्योंकि रिलायंस चीन की जिस कंपनी से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर हासिल करना चाहती थी, उसने अब डील करने से मना कर दिया है, क्योंकि चीन ने टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के नियमों को काफी सख्त कर दिया है।

चीन की कंपनी ने खुद ही डील से हाथ खींचे

ब्लूमबर्ग ने सूत्रों के हवाले से ये खबर दी है कि रिलायंस चीन की लीथियम आयरन फॉस्फेट सप्लायर ज़ियामेन हीथियम एनर्जी स्टोरेज टेक्नोलॉजी कंपनी के साथ सेल तकनीक लाइसेंस करने के लिए चर्चा कर रही थी। मगर चीन के प्रमुख सेक्टर्स में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को सख्त करने की वजह से चीन की इस कंपनी ने प्रस्तावित पार्टनरशिप को खुद ही वापस ले लिया। यह झटका भारत की स्वतंत्र क्लीन एनर्जी सप्लाई चेन बनाने की चुनौतियों को उजागर करता है। ये इस बात को दर्शाता है कि चीन पर निर्भरता कितनी ज्यादा है।

BESS प्रोजेक्ट पर फोकस बढ़ाया

रिलायंस ने इस साल सेल निर्माण शुरू करने का लक्ष्य रखा था। अगस्त में, मुकेश अंबानी ने शेयरधारकों को बताया था कि रिलायंस की बैटरी गीगाफैक्ट्री 2026 में शुरू हो जाएगी। उन्होंने 2021 में चार गीगाफैक्ट्री का निर्माण करने का ऐलान किया था। इसमें 10 बिलियन डॉलर के निवेश की योजना बनाई गई थी। इस झटके के बाद रिलायंस ने बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) यानी अपनी रीन्युएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए कंटेनरों को असेंबल करने पर फिर से फोकस करने का फैसला किया है। रिलायंस के एक प्रवक्ता ने बताया है कि कंपनी की योजनाओं में कोई बदलाव नहीं है। BESS निर्माण, बैटरी पैक निर्माण और सेल निर्माण हमेशा से हमारी एनर्जी स्टोरेज योजनाओं का हिस्सा रहे हैं और हम इनको लागू करने में अच्छी प्रगति कर रहे हैं।

चीन की सख्ती, भारत को झटका

ब्लूमबर्ग के मुताबिक, चीन ने क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी डील्स को लेकर अपनी जांच बढ़ा दी है, क्योंकि वो इन सेक्टर्स में अपनी रणनीतिक बढ़त को खोना नहीं चाहता है। इसका असर ये हुआ कि जो विदेशी मैन्युफैक्चरर्स अपने देश में लोकलाइजेशन की कोशिश में लगे थे, उनकी कोशिशों को धक्का लगा है। भारत का लक्ष्य 2070 तक कार्बन-जीरो बनने का है, मगर ऐसा लगता है कि जो कंपनियां इसमें लगी हुई हैं वो चीन के साथ बेहतर द्विपक्षीय संबंधों के बिना कोई बड़ी प्रगति नहीं कर सकतीं है।

सरकार के इंसेंटिव्स काफी नहीं

भारत लंबे समय से अपनी बैटरी मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी को बनाना चाहता है। 2022 में, रिलायंस की रीन्युएबल एनर्जी यूनिट रिलायंस न्यू एनर्जी भारतीय सरकार की प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव प्रोग्राम (PLI) के तहत बैटरी सेल प्लांट बनाने के लिए बोली जीतने वाली तीन कंपनियों में से एक थी, जो इलेक्ट्रिक व्हीकल्स के लिए इंपोर्टेड सेल्स पर निर्भरता कम करने की कोशिश का हिस्सा थी।

मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने बताया कि मैन्युफैक्चर्स को प्रोजेक्ट पूरा करने से जुड़ी सब्सिडी के रूप में 2 बिलियन डॉलर तक मिलने थे। जिससे कुल 30 गीगावाट-घंटे की एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल क्षमता बनाना था। इस पहल के तहत, कंपनियों को समझौते पर हस्ताक्षर करने के दो साल के अंदर न्यूनतम प्रतिबद्ध निर्माण क्षमता हासिल करनी थी और कम से कम 25% लोकल वैल्यू एडिशन करना था, जो पांच साल में बढ़कर 50% हो जाना था, लेकिन डेडलाइन मिस करने पर रिलायंस को पेनल्टी लगी, जो दर्शाता है कि मौजूदा इंसेंटिव सस्ती चीनी बैटरियों के सामने काफी नहीं है।


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