
अधिकांश परिवारों में यह आम धारणा है कि बैंक खाता, इंश्योरेंस पॉलिसी या म्यूचुअल फंड में नॉमिनी दर्ज कर देने से विरासत का मामला अपने आप सुलझ जाता है। लोगों को लगता है कि नॉमिनी बनने वाला व्यक्ति ही मौत के बाद उस संपत्ति का मालिक बन जाता है। लेकिन कानूनी हकीकत इससे अलग है और यही गलतफहमी कई बार परिवारों के बीच लंबे विवाद की वजह बन जाती है। असल में नॉमिनी और कानूनी वारिस के अधिकार अलग होते हैं और कानून में अंतिम हक हमेशा वारिसों का ही माना गया है।
नॉमिनेशन का उद्देश्य संपत्ति के ट्रांसफर की प्रक्रिया को आसान बनाना होता है, न कि मालिकाना हक तय करना। बैंक, इंश्योरेंस कंपनी या फाइनेंशियल संस्थान नॉमिनी का विकल्प इसलिए देती हैं ताकि दस्तावेजी प्रक्रिया जल्दी पूरी हो सके। नॉमिनी को मिली रकम पर उसका स्वामित्व नहीं बनता, बल्कि वह केवल एक कस्टोडियन यानी संरक्षक होता है। कानून के अनुसार नॉमिनी उस संपत्ति को कानूनी वारिसों तक पहुंचाने के लिए जिम्मेदार होता है।
कानूनी वारिस वह होते हैं जिनका हक उत्तराधिकार कानून या वैध वसीयत के आधार पर तय होता है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम या भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम जैसे कानून यह बताते हैं कि संपत्ति किसे और कैसे मिलेगी। अगर वसीयत नहीं है, तो कानून के अनुसार सभी पात्र वारिसों में संपत्ति बराबर बांटी जाती है। अदालतों ने कई बार यह स्पष्ट किया है कि नॉमिनी मालिक नहीं होता और अंतिम लाभार्थी हमेशा कानूनी वारिस ही होते हैं।
कानूनी रूप से नॉमिनेशन होने पर बैंक या संस्था अपनी जिम्मेदारी निभा देती है, लेकिन इससे विरासत का फैसला नहीं होता। कई बार बड़े अमाउंट के मामलों में बैंक अतिरिक्त दस्तावेज जैसे वसीयत, प्रोबेट या वारिसों की सहमति मांगते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि भविष्य में किसी तरह का कानूनी विवाद न हो। हाल ही में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने निर्देश दिए हैं कि नॉमिनी होने पर अनावश्यक दस्तावेज न मांगे जाएं, लेकिन विवाद की स्थिति में अदालत का आदेश जरूरी हो सकता है।
Published on:
27 Jan 2026 02:31 pm
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