
प्रस्तुति के लिए इस्तेमाल की गई तस्वीर। (फोटो- AI)
Bilaspur High court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए दो आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि केवल लास्ट सीन टुगेदर (अंतिम बार साथ देखे जाने) की थ्योरी के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता, जब तक कि अन्य ठोस और कड़ी साक्ष्य मौजूद न हों। डिवीजन बेंच न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा ने अतिरिक्त सत्र न्यायालय द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को निरस्त कर दिया है।
बता दें कि राजपुर थाना क्षेत्र, जिला बलरामपुर-रामानुजगंज के ग्राम परसागुड़ी में अगस्त 2013 में किशोर गोस्वामी उर्फ गोलचा की हत्या कर शव को सेप्टिक टैंक में फेंक दिया गया था। मामले में अमित भगत उर्फ पिंटू और अशोक टोप्पो उर्फ बाबू को आरोपी बनाते हुए निचली अदालत ने धारा 302 हत्या और 201 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया था। 16 मार्च 2017 को अतिरिक्त सत्र न्यायालय, रामानुजगंज ने दोनों आरोपियों को आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ दोनों आरोपियों ने हाईकोर्ट में अलग-अलग आपराधिक अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि, अभियोजन का पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित है। आरोपियों और मृतक को 7 अगस्त 2013 को सुबह 10 बजे साथ देखा गया, जबकि शव 8 अगस्त 2013 को शाम 4 बजे बरामद हुआ। यानी करीब 29 घंटे का बड़ा अंतर है। इतने लंबे समय के अंतराल में किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अपराध की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि, केवल अंतिम बार साथ देखे जाने से दोष सिद्ध नहीं होता। इसके लिए मजबूत और आपस में जुड़ी परिस्थितियों की श्रृंखला जरूरी है। अभियोजन अन्य कड़ियों को जोड़ने में असफल रहा। कोर्ट ने यह भी माना कि, कथित हथियार पर मिले खून का ब्लड ग्रुप तय नहीं किया गया। जब्त मोबाइल फोन का मृतक से संबंध साबित नहीं हुआ।
Published on:
29 Jan 2026 02:51 pm

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