
सरकारी कर्मचारियों को उच्च शिक्षा के लिए अध्ययन अवकाश उनका अधिकार नहीं ( Photo - Patrika )
Bilaspur High court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारियों को उच्च शिक्षा के लिए अध्ययन अवकाश देना उनका अधिकार नहीं है बल्कि यह नियोक्ता के विवेक पर निर्भर करता है। इस आधार पर कोर्ट ने गणित के एक व्याख्याता की अपील खारिज कर दी। उन्होंने पीएचडी करने के लिए अध्ययन अवकाश की मांग की। मामला सरकारी पॉलिटेक्निक कॉलेज में कार्यरत गणित लेक्चरर से जुड़ा है, जिन्होंने पीएचडी करने के लिए कॉलेज के प्राचार्य के माध्यम से अनुमति मांगी थी। प्राचार्य ने उनका आवेदन कौशल विकास विभाग के सचिव को भेज दिया।
इसके बाद उन्होंने रायपुर स्थित एक शासकीय पोस्ट ग्रेजुएट साइंस कॉलेज में पीएचडी में एडमिशन भी ले लिया और अध्ययन अवकाश के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। हालांकि उनका आवेदन लंबे समय तक लंबित रहा, जिसके बाद उन्होंने हाइकोर्ट में याचिका दायर कर अवकाश पर निर्णय लेने के निर्देश देने की मांग की। एकल पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि उच्च शिक्षा के लिए अध्ययन अवकाश तभी दिया जा सकता है, जब अभ्यर्थी किसी राष्ट्रीय महत्व के संस्थान में प्रवेश ले। याचिकाकर्ता इस शर्त को पूरा करने में असफल रहे। इसके बाद इस आदेश को चुनौती देते हुए उन्होंने डिवीजन बेंच में अपील दाखिल की।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा, जस्टिस बिभु दत्त गुरु की खंडपीठ ने अपील खारिज करते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारी को वही पाठ्यक्रम करने की अनुमति दी जा सकती है, जो उसके संस्थान के हित और उन्नति में सहायक हो। डीबी ने कहा-अध्ययन अवकाश के दौरान कर्मचारी को वेतन और अन्य सुविधाएं मिलती रहती हैं, जो सार्वजनिक धन से दी जाती हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि उच्च शिक्षा पर किया गया यह निवेश संस्थान और समाज के व्यापक हित में उपयोगी हो।
अपीलकर्ता ने दलील दी थी कि उन्होंने पीएचडी जैसे सर्वोच्च शैक्षणिक पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया है, इसलिए उन्हें अध्ययन अवकाश मिलना चाहिए। उन्होंने वर्ष 2022 की उस नीति का भी हवाला दिया जिसमें पीएचडी के लिए अध्ययन अवकाश से संबंधित प्रावधान किए गए। हालांकि कोर्ट ने कहा कि नीति में स्पष्ट रूप से यह शर्त है कि प्रवेश राष्ट्रीय महत्व के संस्थान में होना चाहिए, जबकि याचिकाकर्ता इस मानदंड को पूरा नहीं कर पाए।
Updated on:
11 Mar 2026 01:59 pm
Published on:
11 Mar 2026 01:58 pm
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