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Bharatpur: 4 साल बाद लौटा सुहाग तो गले लगकर खूब रोए भावुक पति-पत्नी, पिता से पहली बार मिली बेटी तो खुशी से झूमी

Emotional Story: नेपाल के गणेश चौधरी को उनके परिवार से चार साल बाद फिर से मिलवाया गया तो सब भावुक हो गए। इस दौरान उनकी पत्नी सुनीता और वृद्ध पिता जगतराम की आंखों में खुशी के आंसू थे।

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apna ghar aasharam

फोटो: पत्रिका

Father Return After 4 Years: 4 साल तक सिंदूर की सच्चाई पर सवाल, बेटी को केवल पिता की तस्वीर दिखाकर पालने का दर्द और बूढ़े पिता की बुझती उम्मीदें। रविवार को ये तीनों पीड़ाएं एक साथ खत्म हुईं, जब अपना घर आश्रम भरतपुर ने नेपाल के गणेश चौधरी को उसके परिवार से मिलाया। मिलन का ये पल ऐसा था कि आंखें बोल रही थीं और शब्द साथ छोड़ चुके थे।

नेपाल निवासी सुनीता जब अपना घर आश्रम पहुंचीं तो उनका गला भर आया। उन्होंने कहा कि हर बार मांग में सिंदूर भरते वक्त मन में यही टीस उठती थी कि मेरा सुहाग जिंदा है भी या नहीं, जब से पति से बात बंद हुई, उन्होंने ठीक से श्रृंगार तक नहीं किया। वह गर्भवती थीं, जब गणेश मजदूरी के लिए कर्नाटक गए थे। जाते समय कहा था कि खुशियां आने से पहले लौट आऊंगा, लेकिन खुशियां तो आईं, पति नहीं आए।

4 साल में सुनीता ने अपनी नन्हीं बेटी को केवल पिता की तस्वीर दिखाकर बड़ा किया। बेटी पूछती थी, पापा कहां हैं तो वही तस्वीर आगे कर देती थीं। अब उन्हें यह तस्वीर नहीं दिखानी पड़ेगी, अब बेटी को असली पिता का साया मिला है। पति को सामने देखकर सुनीता की आंखों से खुशी के आंसू थम नहीं रहे थे।

पिता भी हो उठे भावुक

गणेश के वृद्ध पिता जगतराम थारू भी भावुक हो उठे। उन्होंने कहा कि उन्होंने बेटे की तलाश में हर कोशिश की, लेकिन धीरे-धीरे उम्मीद छोड़ चुके थे। लगा था कि बुढ़ापे की लाठी और सहारा कभी वापस नहीं मिलेगा। आज बेटे को देखकर ऐसा लगा जैसे जीवन की खोई हुई बैसाखी लौट आई हो।

दरअसल गणेश चार साल पहले कर्नाटक में मजदूरी कर करीब 40 हजार रुपए कमाकर घर लौट रहे थे, तभी रास्ते में जहरखुरानी गिरोह का शिकार हो गए। मानसिक आघात के कारण उनकी सुध-बुध जाती रही और वे घर नहीं पहुंच सके। दो साल तक वे कहां रहे, इसका उन्हें भी पता नहीं। बाद में वे लखीमपुर खीरी जिला चिकित्सालय पहुंचे। वहां से जिला चिकित्सा प्रभारी ने अपना घर आश्रम को सूचना दी।

चार प्रभुजनों को वहां से अपना घर भरतपुर लाया गया, जिनमें गणेश भी शामिल थे। यहां उपचार और सेवा के बाद गणेश को अपना पता याद आया। इसके बाद अपना घर की पुनर्वास टीम ने नेपाल स्थित अपना घर आश्रम के सहयोग से परिवार की तलाश की और अंतत: परिजन मिल गए। सूचना मिलते ही पत्नी सुनीता, पिता जगतराम और मासूम बेटी गणेश को लेने भरतपुर पहुंचे।

50 से अधिक नेपाली प्रभुजनों का हुआ पुनर्वास

अपना घर आश्रम के सचिव बसंतलाल गुप्ता ने बताया कि संस्था अब तक 50 से अधिक नेपाली प्रभुजनों का सफल पुनर्वास कर चुकी है। जरूरत पड़ने पर नेपाल स्थित आश्रमों की भी मदद ली जाती है। रविवार को आवश्यक कागजी प्रक्रिया पूरी कर गणेश को उनकी पत्नी बेटी और पिता को सुपुर्द कर दिया गया।

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