
ज्योर्तिमठ के पीठाधीश स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज (Photo/ANI)
प्रयागराज मेंं चल रहे माघ मेले में धरने पर बैठे ज्योर्तिमठ के पीठाधीश स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य लिखने पर स्थानीय प्रशासन ने जवाब मांगा, जिस पर काफी विवाद हुआ। इसके बाद विवाद बढ़ा तो स्वयंभू शंकराचार्यों का मामला भी सामने आया। ऐसे में जानना आवश्यक है कि सनातन धर्म के सबसे बड़े धर्माचार्य माने जाने वाले शंकराचार्य की नियुक्ति आखिर कैसे होती है।
आठवीं सदी में जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने देश भर में भ्रमण कर सनातन धर्म के अद्वैत सिद्धांत का प्रचार प्रसार किया। इसी सिद्धांत को लेकर उनका कई विद्वानों से शास्त्रार्थ हुआ। इनमें कई जैन आचार्य, बौद्ध मत के विद्वान भी शामिल थे। इसके बाद आदि शंकराचार्य ने चार पीठों की स्थापना की। हर पीठ को एक वेद, एक महावाक्स और एक संन्यास की परंपरा सौंपी गई। श्रृंगेरी शारदा पीठ(दक्षिण), द्वारका शारदा पीठ(पश्चिम), पुरी गोवर्धन पीठ (पूर्व) और ज्योतिर्मठ या बदरिकाश्रम (उत्तर)। इन पीठों के संरक्षक एवं मुख्य अधिष्ठाता को ही जगतगुरु शंकराचार्य कहा गया।
शंकराचार्य बनने के लिए पहली व अनिवार्य शर्त संन्यास की होती है। संन्यासी गृहस्थ, ब्रम्हचारी या वानप्रस्थ जैसे पदों के अधिकारी नहीं माने जाते। उनके लिए ब्रम्हसूत्र और शंकरभाष्य का ज्ञान, धर्मशास्त्र, उपनिषद, वेदों का ज्ञान होना भी आवश्यक होता है। जीवनभर के लिए त्याग और वैराग्य की प्रतिज्ञा का भी उन्हें पालन करना होता है। शंकराचार्यों का दशनामी परपंरा से आना भी आवश्यक होता है। आदि शंकराचार्य ने संन्यासियों को दस नामों गिरि, पर्वत, सागर, तीर्थ, आश्रम, सरस्वती आदि में बांटा था। इसी परंपरा को दशनामी संप्रदाय कहा जाता है। चारों पीठों के शंकराचार्य इसी परंपरा से आते हैं।
शंकराचार्य पद के लिए नामित अभ्यर्थी योग्यता को लेकर विद्वत संस्थाएं और काशी विद्वत परिषद जैसी संस्थाओं की भी भूमिका होती है। वहीं गुरु-शिष्य परंपरा के अनुसार जीवित शंकराचार्य अपने जीतवकाल में ही योग्य शिष्य को चुनते हैं। यह चयन वर्षों की शिक्षा, तप और परीक्षाण के आधार पर होता है। इसका उल्लेख माधवीय शंकरविजय और मठीय परंपराओं में मिलता है। शिष्य की योग्यता को लेकर गुरु जब निश्चित हो जाते हैं तब उसे उत्तराधिकारी घोषित किया जाता है। इनमेंं अन्य मठों के शंकराचार्यों की सहमति भी शामिल होती है। इसके बाद पट्टाभिषेक नामक धार्मिक विधि का निर्वाहन कर औपचारिक रूप से पीठाधीश्वर घोषित किए जाते हैं।
मठाम्नाय अनुशासन शंकराचार्यों की नियुक्ति, योग्यता और भूमिका को सझने का सबसे प्रामाणिक स्त्रोत है। आदि शंकराचार्य ने इसकी रचना की थी। यह रचना चारों मठों के नियम, सिद्धांतों का वर्णन करती है। इसे महानुशसान भी कहा जाता है। इसमें मठों के अनुशासन और कार्यप्रणाली के साथ ही विद्वानों और पीठाधीश्वरों के कर्तव्य भी बताए गए हैं। परंपरा अनुसार शंकराचार्य आजीवन पद पर रहते हैं।
Updated on:
26 Jan 2026 03:13 am
Published on:
26 Jan 2026 03:12 am
बड़ी खबरें
View Allधर्म/ज्योतिष
ट्रेंडिंग
