China Legal Warfare :अमेरिकी कांग्रेस आयोग की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन अब ताइवान के खिलाफ 'लीगल वॉरफेयर' का इस्तेमाल कर रहा है, जिसके तहत ताइवानी सांसदों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं।
Cross Border Repression : ताइवान को चारों तरफ से घेरने की कोशिशों में जुटे चीन ने अब एक नया और खतरनाक पैंतरा आजमाया है। चीनी सरकार अब ताइवान की आवाज दबाने के लिए सैन्य धमकियों के साथ-साथ कानूनी हथकंडों का सहारा ले रही है। अमेरिकी कांग्रेस आयोग की एक ताजा रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, बीजिंग प्रशासन ताइवान के संप्रभुता समर्थकों और अपने आलोचकों को चुप कराने के लिए 'कानूनी लड़ाई' का दायरा तेजी से बढ़ा रहा है। इसे चीन के सीमा पार दमन के बढ़ते अभियान के रूप में देखा जा रहा है।
इस रिपोर्ट में ताइवान के सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी के सांसद पुमा शेन का विशेष रूप से जिक्र किया गया है। शेन को साल 2024 में चीन ने अपनी ब्लैकलिस्ट में डाला था, लेकिन अब मामला सिर्फ प्रतिबंधों तक सीमित नहीं रह गया है। चीन के चोंगकिंग शहर में अधिकारियों ने शेन के खिलाफ बाकायदा आपराधिक जांच शुरू कर दी है और उन्हें 'ताइवान की स्वतंत्रता का कट्टर अलगाववादी' घोषित कर दिया है।
रक्षा और भू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चीन की इस रणनीति में आया यह बदलाव बहुत संवेदनशील है। ऐसा पहली बार है जब चीन ने ताइवान के किसी मौजूदा सांसद के खिलाफ इस तरह की न्यायिक कार्रवाई की है। विश्लेषकों के अनुसार, पहले चीन केवल प्रशासनिक प्रतिबंध लगाता था, लेकिन अब वह सीधे आपराधिक मुकदमे चला रहा है। ऐसा करके चीन दुनिया के सामने यह साबित करना चाहता है कि ताइवान उसके कानूनी अधिकार क्षेत्र में आता है।
यह रिपोर्ट केवल ताइवान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन का बढ़ता दबाव भी उजागर करती है। रिपोर्ट में 'इंटर-पार्लियामेंट्री अलायंस ऑन चाइना' की मिसाल दी गई है। आईपीएसी दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों के सांसदों का एक समूह है, जो चीन की आक्रामक नीतियों के खिलाफ काम करता है।
पिछले साल ब्रुसेल्स में आयोजित आईपीएसी शिखर सम्मेलन में ताइवान की उपराष्ट्रपति ह्सियाओ बि-खिम ने हिस्सा लिया था। चीन इस बैठक से इतना बौखला गया कि उसने इसे फ्लॉप कराने के लिए परदे के पीछे से पूरी ताकत झोंक दी। रिपोर्ट के अनुसार, सम्मेलन में भाग लेने के लिए 12 अफ्रीकी देशों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया था, लेकिन चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के भारी दबाव के कारण उनमें से केवल दो प्रतिनिधि ही कार्यक्रम में पहुंच पाए।
इस मामले पर वैश्विक कूटनीतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। ताइवान के विदेश मंत्रालय ने चीन के इस कदम को उसकी हताशा का प्रतीक बताया है। वहीं, मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने चीन के इस 'अदालती दमन' का विरोध नहीं किया, तो बीजिंग भविष्य में अन्य देशों के नागरिकों और नेताओं के खिलाफ भी इसी तरह के एकतरफा कानूनी कदम उठा सकता है।
ताइवान सरकार अब इस कानूनी खतरे से निपटने के लिए अपने सांसदों और नीति निर्माताओं के लिए एक नया सुरक्षा प्रोटोकॉल तैयार कर रही है। इसके साथ ही, ताइवान उन देशों के साथ अपने प्रत्यर्पण समझौतों की समीक्षा कर रहा है, जहाँ चीनी प्रभाव ज्यादा है, ताकि उसके नेताओं को किसी तीसरे देश में गिरफ्तार न किया जा सके।
बहरहाल, इस पूरे विवाद का एक आर्थिक पहलू भी है। चीन की इस कानूनी आक्रामकता के बाद ताइवान की टेक और सेमीकंडक्टर कंपनियों में काम करने वाले अधिकारियों में डर का माहौल है। चीनी बाजार या चीन के मित्र देशों की यात्रा करने वाले ताइवानी पेशेवरों को अब यह डर सताने लगा है कि चीन उन्हें किसी भी फर्जी कानून के तहत निशाना बना सकता है, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध और कमजोर होंगे। ( इनपुट : ANI)