Purushottam Maas 2026: पुरुषोत्तम मास की शुरुआत एक ऐसी दिव्य सभा से होती है, जहां ऋषियों ने मानव जीवन के सबसे बड़े प्रश्न मोक्ष का उत्तर खोजा। शुकदेव, सूतजी और राजा परीक्षित से जुड़ी यह कथा आज भी भक्ति और वैराग्य का सबसे बड़ा संदेश मानी जाती है।
Purushottam Maas 2026 Katha : नैमिषारण्य की पवित्र भूमि पर जब देशभर के महान ऋषि एकत्र हुए, तब शुरू हुई ऐसी दिव्य कथा जिसने भक्ति, ज्ञान और मोक्ष का मार्ग दिखाया। पुरुषोत्तम मास की यह पहली कथा केवल धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला आध्यात्मिक संदेश भी है। आखिर क्यों शुकदेव, सूतजी और परीक्षित का यह प्रसंग आज भी इतना महत्वपूर्ण माना जाता है? पढ़िए पूरी कथा।
सनातन धर्म में पुरुषोत्तम मास को भगवान विष्णु का सबसे प्रिय महीना माना गया है। इसे अधिक मास भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस महीने में किया गया जप, तप, दान और कथा-श्रवण कई गुना फल देता है। इसी पुरुषोत्तम मास के माहात्म्य की शुरुआत होती है एक अद्भुत आध्यात्मिक सभा से, जहाँ हजारों ऋषि-मुनि मानव जीवन के कल्याण का उपाय जानने के लिए एकत्र हुए थे।
कथा के अनुसार, परम पवित्र नैमिषारण्य में अनेक महान तपस्वी और वेदों के ज्ञाता ऋषि यज्ञ करने के उद्देश्य से पहुंचे। वहां का वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा हुआ था। सभी ऋषि केवल अपने कल्याण के लिए नहीं, बल्कि पूरे संसार के हित के लिए चिंतित थे।
ये सभी मुनि धर्म, तपस्या और वेद ज्ञान में पारंगत थे। उनका उद्देश्य था ऐसा ज्ञान प्राप्त करना जिससे कलियुग में भी मनुष्य भगवान की भक्ति के माध्यम से जीवन को सफल बना सके।
इसी दौरान तीर्थयात्रा करते हुए सूतजी भी वहां पहुंचे। उनके व्यक्तित्व में अद्भुत तेज था। माथे पर ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक, गले में तुलसी की माला और मुख पर दिव्य शांति देखकर सभी ऋषि सम्मान में खड़े हो गए।
ऋषियों ने सूतजी से कहा कि संसार में सुनने योग्य विषय तो हजारों हैं, लेकिन वे ऐसा सार बताएं जो मनुष्य को जन्म-मरण के दुखों से मुक्त कर सके। उन्होंने भगवान की लीलाओं से जुड़ी ऐसी कथा सुनाने की प्रार्थना की जो जीवन को आनंद और शांति से भर दे।
सूतजी ने बताया कि वे कई पवित्र तीर्थों की यात्रा करके आए हैं। उन्होंने पुष्कर, काशी, प्रयाग, गया, बद्रीनाथ, रामेश्वरम, गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा और कावेरी जैसी पवित्र नदियों और धामों में स्नान किया।
उन्होंने बताया कि इन तीर्थों की यात्रा केवल शरीर की नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि का मार्ग है। हर तीर्थ मनुष्य को अहंकार छोड़कर ईश्वर की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।
आज भी भारत में करोड़ों श्रद्धालु पुरुषोत्तम मास में तीर्थ यात्रा, कथा और भजन-कीर्तन को विशेष महत्व देते हैं। उज्जैन, वृंदावन, नासिक, हरिद्वार और जगन्नाथपुरी में इस दौरान विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं।
सूतजी ने आगे बताया कि हस्तिनापुर पहुंचने पर उन्हें पता चला कि राजा परीक्षित अपना राजपाट छोड़कर गंगा तट पर पहुंच चुके हैं। उन्हें अपने जीवन का अंतिम समय निकट दिखाई दे रहा था।
गंगातट पर देशभर के योगी, तपस्वी और सिद्ध पुरुष एकत्र थे। कोई केवल जल पीकर तप कर रहा था, कोई वायु पर जीवन बिता रहा था, तो कोई फलाहार से साधना कर रहा था। पूरा वातावरण वैराग्य और तपस्या से भरा हुआ था।
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सत्ता, धन और वैभव भी अंत समय में मनुष्य को शांति नहीं दे सकते। अंततः ईश्वर का नाम ही सबसे बड़ा सहारा बनता है।
कथा का सबसे भावुक और चमत्कारी प्रसंग तब आया जब महर्षि व्यास के पुत्र शुकदेव जी वहां पहुंचे। केवल 16 वर्ष की आयु में ही वे ब्रह्मज्ञान के शिखर पर थे।
उनका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और अलौकिक था। उन्हें देखते ही सभी ऋषि सम्मान में खड़े हो गए। शुकदेव जी संसार से पूरी तरह विरक्त थे, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में उनकी अटूट भक्ति थी।
कहा जाता है कि बाद में इन्हीं शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत कथा सुनाई, जिसे सुनकर राजा को मोक्ष प्राप्त हुआ।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, पुरुषोत्तम मास वह समय है जब भगवान विष्णु स्वयं भक्तों के पापों का नाश कर उन्हें पुण्य प्रदान करते हैं। यही कारण है कि इस महीने में-
धर्मग्रंथों में यह भी कहा गया है कि जो व्यक्ति पुरुषोत्तम मास में कथा सुनता है, उसके जीवन के कष्ट धीरे-धीरे कम होने लगते हैं।
यह कथा केवल धार्मिक इतिहास नहीं है। इसमें आधुनिक जीवन के लिए भी बड़ा संदेश छिपा है। आज इंसान भागदौड़, तनाव और लालच में उलझता जा रहा है। ऐसे समय में पुरुषोत्तम मास की यह कथा हमें याद दिलाती है कि सच्ची शांति बाहरी सुखों में नहीं, बल्कि आत्मिक संतुलन और भक्ति में है।
ऋषियों की सभा हमें सिखाती है कि ज्ञान का उद्देश्य केवल बहस नहीं, बल्कि समाज और मानवता का कल्याण होना चाहिए। वहीं शुकदेव और परीक्षित का प्रसंग यह बताता है कि मृत्यु का भय भी भक्ति और ज्ञान से समाप्त हो सकता है।
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य का पहला अध्याय भक्ति, वैराग्य और ज्ञान का अद्भुत संगम है। नैमिषारण्य की सभा से लेकर शुकदेव जी के आगमन तक हर प्रसंग मनुष्य को ईश्वर के करीब ले जाने का संदेश देता है।
यही कारण है कि सदियों बाद भी यह कथा करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई है।
॥ हरिः शरणम् ॥