Chhattisgarh Rice Scheme: नई योजना के तहत चावल की गुणवत्ता, मिलिंग तकनीक और भंडारण व्यवस्था में बड़े बदलाव होंगे, जिससे किसानों, राइस मिलर्स और बाजार को फायदा मिलने की उम्मीद है।
Improved Rice Scheme: भारत सरकार की नई ‘इम्प्रूव्ड राइस स्कीम’ को लेकर छत्तीसगढ़ में तैयारियां तेज हो चुकी हैं। राज्य सरकार आगामी खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 से इसे लागू करने की दिशा में काम कर रही है। रायपुर में आयोजित राज्य स्तरीय कार्यशाला में खाद्य विभाग, भारतीय खाद्य निगम (FCI), मार्कफेड और राइस मिलर्स एसोसिएशन के बीच इस योजना के तकनीकी और व्यावहारिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई। माना जा रहा है कि यह योजना आने वाले समय में छत्तीसगढ़ के धान और चावल उद्योग की पूरी कार्यप्रणाली बदल सकती है।
यह केंद्र सरकार की नई गुणवत्ता आधारित योजना है, जिसका मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और केंद्रीय भंडारण के लिए बेहतर गुणवत्ता वाला चावल तैयार करना है। इसके तहत चावल में टूटन (Broken Rice) की मात्रा कम रखने, बेहतर मिलिंग तकनीक अपनाने और भंडारण व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया जाएगा।
नई व्यवस्था के अनुसार: अरवा चावल में अधिकतम 10% ब्रोकन की अनुमति होगी। उसना चावल में अधिकतम 5% ब्रोकन मानक तय किया गया है। यानी अब कम गुणवत्ता वाले या अधिक टूटन वाले चावल की गुंजाइश कम होगी।
छत्तीसगढ़ देश के सबसे बड़े धान उत्पादक राज्यों में शामिल है। यहां बड़ी संख्या में किसान धान उत्पादन पर निर्भर हैं और हजारों राइस मिलें धान प्रोसेसिंग से जुड़ी हुई हैं। राज्य सरकार हर साल समर्थन मूल्य पर बड़ी मात्रा में धान खरीदती है और उसका चावल केंद्र सरकार को भेजा जाता है।
नई स्कीम लागू होने से छत्तीसगढ़ के चावल की राष्ट्रीय स्तर पर गुणवत्ता पहचान मजबूत होगी। निर्यात और इंटर-स्टेट सप्लाई के अवसर बढ़ सकते हैं। किसानों को बेहतर धान किस्मों की खेती के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। आधुनिक मशीनरी और मिलिंग सिस्टम का उपयोग बढ़ेगा।
यदि योजना सही तरीके से लागू होती है तो किसानों को कई स्तर पर लाभ मिल सकता है:
सरकार और मिलर्स अब ऐसी धान किस्मों को प्राथमिकता देंगे जिनसे कम टूटन वाला उच्च गुणवत्ता चावल तैयार हो सके। इससे उन्नत बीजों और वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा मिलेगा।
भविष्य में गुणवत्ता आधारित खरीद व्यवस्था मजबूत हो सकती है। इससे बेहतर धान उत्पादन करने वाले किसानों को अधिक लाभ मिलने की संभावना बढ़ेगी।
नई स्कीम के चलते किसानों को नमी नियंत्रण, साफ-सफाई, स्टोरेज और कटाई के वैज्ञानिक तरीकों की जानकारी दी जा सकती है।
नई व्यवस्था में सबसे बड़ी जिम्मेदारी राइस मिलर्स पर आएगी। उन्हें नई मिलिंग मशीनें लगानी पड़ सकती हैं। गुणवत्ता जांच सिस्टम मजबूत करना होगा। स्टोरेज और पैकेजिंग में सुधार करना होगा। ब्रोकन राइस प्रतिशत नियंत्रित रखना होगा। इसी वजह से राइस मिलर्स एसोसिएशन ने सरकार से तकनीकी सहायता और लागत बढ़ने पर आर्थिक सहयोग की मांग की है।
इस स्कीम का सीधा असर राशन दुकानों और बाजार में मिलने वाले चावल की गुणवत्ता पर पड़ सकता है। यदि योजना सफल रही तो: PDS में बेहतर गुणवत्ता का चावल मिलेगा। खराब और अधिक टूटन वाले चावल की शिकायतें कम होंगी। भंडारण और परिवहन के दौरान नुकसान घटेगा।
हालांकि योजना को लेकर उत्साह है, लेकिन कई चुनौतियां भी सामने हैं:
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह योजना सफलतापूर्वक लागू होती है तो छत्तीसगढ़ सिर्फ “धान का कटोरा” ही नहीं, बल्कि “उच्च गुणवत्ता वाले चावल का हब” भी बन सकता है। इससे राज्य के कृषि और खाद्य उद्योग को नई दिशा मिल सकती है।