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प्रसंगवश: औद्योगिक अपशिष्ट रोकने में सख्ती जरूरी

समस्या सिर्फ तकनीक की ही नहीं, इच्छाशक्ति और जवाबदेही की भी

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Photo: AI

जल प्रदूषण के लिए जिम्मेदार कारकों में औद्योगिक अपशिष्ट का नदी-नालों में विसर्जन सबसे अहम है। राजस्थान की नदियां भी इस संकट से जूझ रही हैं। देर से ही सही जयपुर में प्रदूषित होती जा रही द्रव्यवती नदी की सरकार ने सुध ली है। मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास के निरीक्षण के बाद अब द्रव्यवती में प्रदूषित जल छोड़ने पर कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। बात सिर्फ द्रव्यवती की ही नहीं है, प्रदेशभर में नदियों के पानी को जहर बनाने का काम लगातार जिम्मेदारों की अनदेखी की वजह से हो रहा है।

हाड़ौती की जीवनरेखा चम्बल में कोटा शहर के 18 नालों का गिरना, चन्द्रलोई में औद्योगिक अपशिष्ट का बहना और मारवाड़ की लूनी, जोजरी व बांडी नदियों में रंगाई-छपाई इकाइयों का जहरीला पानी, ये सब मिलकर भयावह तस्वीर पेश करते हैं। चिंता इस बात की भी है कि नदियों में अपशिष्ट का प्रवाह सिर्फ पर्यावरणीय संकट ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि और हमारी पीढ़ियों के अस्तित्व का भी सवाल है। राज्य में कॉमन एफलुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) और सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) जैसे समाधान वर्षों से मौजूद हैं, लेकिन उनकी कार्यक्षमता और निगरानी पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।


हैरत की बात है कि सांगानेर का सीईटीपी, जिसकी क्षमता 12.3 एमएलडी बताई जाती है, पूरी क्षमता से नहीं चल रहा। 1200 में से सैकड़ों इकाइयां अब भी इससे जुड़ी नहीं हैं। ऐसे में यह पूछना लाजिमी है, जब सिस्टम मौजूद है, तो प्रदूषण क्यों नहीं रुक रहा? दरअसल, समस्या तकनीक की नहीं, इच्छाशक्ति और जवाबदेही की है।

उद्योगों के लिए नियम हैं, लेकिन उनका पालन सुनिश्चित करने वाला तंत्र कमजोर है। एक और गंभीर पहलू है, जनभागीदारी का अभाव। जब तक स्थानीय समुदाय इस गंभीर मुद्दे पर आगे नहीं आएंगे तब तक प्रशासनिक सक्रियता सफल भी नहीं हो सकती। हर नाले को ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ना, उद्योगों को नियमों के दायरे में लाना, उल्लंघन पर त्वरित कार्रवाई… यही वह रास्ता है, जो नदियों को फिर से जीवन दे सकता है।

आशीष जोशी: ashish.joshi@in.patrika.com