गिरफ्तारी के बाद मामला फिर अदालत पहुंचा, तो वकील ने मौखिक संरक्षण का दावा किया और अदालत ने इसे मानते हुए रिहाई के आदेश दे दिए।
आभा सिंह, (लेखिका बॉम्बे हाईकोर्ट में अधिवक्ता हैं)
न्यायशास्त्र का एक स्थापित सिद्धांत है कि कोई भी न्यायाधीश तब तक किसी मामले का फैसला करने का दावा नहीं कर सकता, जब तक कि उसने उसे लिखित रूप में दर्ज न किया हो। इसके बावजूद, देश की अदालतों में यह चिंताजनक चलन बना हुआ है कि कई बार न्यायाधीश खुली अदालत में गिरफ्तारी पर रोक, रिहाई या जांच से संरक्षण जैसे मौखिक निर्देश जारी कर देते हैं, जो औपचारिक लिखित आदेश का हिस्सा नहीं बनते। ऐसे मौखिक निर्देश न्यायालय के अधिकार की शक्ति तो रखते हैं, लेकिन जवाबदेही से बच निकलते हैं। वे न्यायिक विमर्श और न्यायिक निर्णय के बीच एक ऐसा धुंधला क्षेत्र बनाते हैं, जहां एक पक्ष उनका लाभ उठाता है और दूसरा पक्ष उन्हें नकार सकता है। चूंकि उनका कोई रेकॉर्ड नहीं होता, इसलिए उनके खिलाफ अपील भी संभव नहीं होती।
हाल में इलाहाबाद उच्च न्यायालय से जुड़ा विवाद इसी समस्या को फिर सामने ले आया है। यह कोई अकेली घटना नहीं, बल्कि उस बुनियादी सिद्धांत के क्षरण का संकेत है कि न्यायिक शक्ति का प्रयोग पारदर्शी और कारणयुक्त लिखित आदेशों के माध्यम से ही होना चाहिए। इससे इतर कुछ भी केवल प्रक्रियात्मक त्रुटि ही नहीं, बल्कि संवैधानिक दृष्टि से भी संदिग्ध है।
उच्चतम न्यायालय ने कई मामलों में साफ किया है कि लिखित आदेश कोई कागजी औपचारिकता नहीं, बल्कि न्यायिक जवाबदेही की आधारशिला है। 'सलीमभाई हामिदभाई मेनन बनाम नितेशकुमार मगनभाई पटेल' (2022) में गुजरात हाईकोर्ट की एकलपीठ ने एक आरोपी की गिरफ्तारी पर कथित मौखिक रोक लगा दी, लेकिन लिखित आदेश में इसका कोई जिक्र नहीं था। गिरफ्तारी के बाद मामला फिर अदालत पहुंचा, तो वकील ने मौखिक संरक्षण का दावा किया और अदालत ने इसे मानते हुए रिहाई के आदेश दे दिए। इस पर तत्कालीन न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने स्पष्ट कहा कि अदालत की मौखिक टिप्पणियां न्यायिक संवाद का हिस्सा होती हैं, बाध्यकारी और लागू करने योग्य केवल लिखित आदेश ही होता है।
गिरफ्तारी रोकने जैसे मौखिक निर्देश न्यायिक रेकॉर्ड का हिस्सा नहीं होते और उनसे बचा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि ऐसे निर्देश भ्रम पैदा करते हैं, दुरुपयोग को बढ़ावा देते हैं और खतरनाक मिसाल कायम करते हैं। अदालत ने जो कहा, उसे देश की हर अदालत के दरवाजे पर लिखा जाना चाहिए, 'न्यायाधीश अपने निर्णयों और आदेशों के माध्यम से बोलते हैं। लिखित पाठ को ही चुनौती दी जा सकती है। जहां मौखिक व्यवस्था हावी हो जाती है, वहां न्यायिक जवाबदेही समाप्त हो जाती है।' यह केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक संवैधानिक सिद्धांत की उद्घोषणा है। असाधारण अंतरिम राहत देने वाले आदेशों में कारण दर्ज करना अनिवार्य है।
'नीहारिका इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रा. लि. बनाम महाराष्ट्र राज्य' (2021) मामले में तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था कि अदालत को यह बताना होगा कि उसने अंतरिम राहत क्यों दी। कारण चाहे संक्षिप्त हों, लेकिन उनसे न्यायिक विवेक का प्रयोग स्पष्ट होना चाहिए। 'क्रांति एसोसिएट्स प्रा. लि. बनाम मसूद अहमद' (2010) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कारण दर्ज करना शक्ति के मनमाने इस्तेमाल पर रोक लगाता है। जिस मौखिक निर्देश का कोई रेकॉर्ड नहीं है, उसका विधि में अस्तित्व भी संदिग्ध है। जब कोई न्यायाधीश मौखिक रूप से गिरफ्तारी रोकता है, तो व्यवहार में वह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 की प्रक्रियाओं का पालन किए बिना अग्रिम जमानत जैसी राहत दे रहा होता है। ये प्रक्रियाएं जांच एजेंसी के अधिकारों की रक्षक हैं।
एक मौखिक टिप्पणी के आधार पर गिरफ्तारी रोकना निष्पक्ष जांच को प्रभावित कर पीडि़त तथा समाज के अधिकारों को नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसी स्थिति में जांच एजेंसी के पास ऊपरी अदालत में चुनौती देने के लिए कोई लिखित आदेश ही नहीं होता। भारत की उच्च न्यायपालिका को स्वतंत्रता और संस्थागत सुरक्षा प्राप्त है, जो न्यायिक स्वतंत्रता के लिए आवश्यक भी है। लेकिन इसके साथ उस पर यह जिम्मेदारी भी है कि न्यायिक शक्ति का प्रयोग पारदर्शी और तर्कसंगत ढंग से हो, ताकि उच्चतर अदालतें और जनता उसकी समीक्षा कर सकें। लिखित आदेश इसी जवाबदेही का प्रमुख माध्यम है, जिसके आधार पर कोई पक्ष अपील कर सकता है और उच्च अदालतें यह परख सकती हैं कि कानून का सही इस्तेमाल हुआ या नहीं।
यदि न्याय केवल मौखिक निर्देशों पर आधारित होने लगे, तो पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। अंधेरे में हुआ अन्याय कभी सुधारा नहीं जा सकता, क्योंकि रेकॉर्ड पर वह कभी हुआ ही नहीं था। यह तर्क दिया जाता है कि अदालतों में अनेक मौखिक चर्चाएं होती हैं और हर टिप्पणी को लिखना संभव नहीं है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक विमर्श और कानूनी प्रभाव वाले निर्देशों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया है।
यदि कोई न्यायाधीश कहता है कि प्रथम दृष्टया एफआइआर में कुछ खामियां दिखती हैं और वह आगे की बहस सुनना चाहता है, तो यह वैध न्यायिक संवाद है। लेकिन यदि वह साथ ही यह कह दे कि तब तक गिरफ्तारी न हो और इसका लिखित आदेश में उल्लेख न करे, तो वह संवाद की सीमा पार कर निर्णय के क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है। ऐसा निर्णय पारदर्शिता से परे होता है। मौखिक निर्देशों को बाध्यकारी मानने से उनके दुरुपयोग का रास्ता खुल जाता है। पीठें बदलती रहती हैं और नए न्यायाधीश के पास इसका कोई रेकॉर्ड नहीं होता कि पुराने न्यायाधीश ने क्या कहा था। इससे इस मूल सिद्धांत को क्षति होती है कि 'न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखाई भी देना चाहिए।' अंतत:, यह सिद्धांत कि न्यायाधीश अपने आदेशों और निर्णयों के माध्यम से बोलते हैं, कोई तकनीकी नियम नहीं है। यह संवैधानिक लोकतंत्र की इस मूल भावना का हिस्सा है कि शक्ति का इस्तेमाल पारदर्शी तरीके से हो। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का हालिया विवाद बताता है कि समस्या अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
इसका समाधान बस यही है कि न्यायाधीश वही करें जिसकी उनसे संविधान अपेक्षा करता है-अपने निर्णयों को स्पष्ट, तर्कपूर्ण और लिखित आदेशों के रूप में दर्ज करना। क्योंकि जवाबदेही के लिए दृश्यता जरूरी है, दृश्यता के लिए लेखन जरूरी है और लिखित शब्द ही न्यायिक अधिकार की वास्तविक शक्ति और आधार हैं।