चीन ने इन कारोबारियों का गर्मजोशी से स्वागत कर यह स्पष्ट संदेश दिया कि उसके दरवाजे खुले हैं और 1.4 अरब लोगों के विशाल बाजार तथा उसकी विनिर्माण क्षमता को नजरअंदाज करना अमरीका के लिए संभव नहीं है।
राजीव रंजन, (एसोसिएट प्रोफेसर, चीनी अध्ययन, पूर्वी एशियाई अध्ययन विभाग, दिल्ली विवि)
अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के चीन दौरे के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ट्रंप की राजशाही दौर के बगीचे 'चोंगनानहाय' में चहलकदमी, भले ही एक औपचारिक दृश्य लगे लेकिन चीन की नजर में इसका अर्थ कहीं अधिक गहरा था। यह एक चोंगनानहाय परिसर, फॉरबिडन सिटी से सटा हुआ, चीनी शासन और कम्युनिस्ट पार्टी का शक्ति केंद्र माना जाता है। शी जिनपिंग द्वारा ट्रंप की वहां अगवानी करना एक स्पष्ट राजनयिक संकेत था कि बीजिंग वाशिंगटन के साथ अपने रिश्तों को लेकर गंभीर है। साथ ही, यह ट्रंप के व्यक्तित्व-केंद्रित राजनीतिक अंदाज को साधने का भी एक सटीक प्रयास था। यह दौरा केवल प्रतीकात्मक नहीं था, बल्कि वर्षों के टकराव के बाद दोनों महाशक्तियों का आर्थिक वास्तविकताओं के सामने झुकना भी था। चीन ने इस यात्रा के जरिए स्पष्ट कर दिया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। नौ वर्षों में पहली बार कोई अमरीकी राष्ट्रपति बीजिंग पहुंचा था।
सालों की कूटनीतिक और सामरिक तनातनी, टैरिफ युद्ध, तकनीकी प्रतिबंध और सप्लाई चेन की खींचतान के बाद चीन अमरीका को यह संदेश दे रहा था कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से दूरी बनाना इतना आसान नहीं है। इस यात्रा का सबसे दिलचस्प पहलू ट्रंप के साथ आया कारोबारी प्रतिनिधिमंडल था। इसमें 17 बड़े सीईओ शामिल थे, जिनकी कंपनियों की कुल कीमत 10 खरब डॉलर से भी अधिक आंकी गई। एलन मस्क, टिम कुक, जेंसन हुआंग, बोइंग के प्रमुख तथा ब्लैकरॉक और गोल्डमैन सैक्स जैसी कंपनियों के दिग्गजों की मौजूदगी अपने आप में बहुत कुछ कह रही थी। अमरीका को तेल, गैस, सोयाबीन और हवाई जहाज से जुड़े बड़े सौदों की आवश्यकता थी। चीन ने इन कारोबारियों का गर्मजोशी से स्वागत कर यह स्पष्ट संदेश दिया कि उसके दरवाजे खुले हैं और 1.4 अरब लोगों के विशाल बाजार तथा उसकी विनिर्माण क्षमता को नजरअंदाज करना अमरीका के लिए संभव नहीं है। वहीं ट्रंप समर्थकों का एक वर्ग अब भी चीन-अमरीका व्यापार घाटे को अमरीकी मजदूरों की तबाही का कारण मानता है। इसके बावजूद चीन यह जताना चाहता है कि गहरे और परस्पर आर्थिक संबंध ही दोनों देशों के रिश्तों को स्थिर बनाए रख सकते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ट्रंप का यह कदम यह साबित करता है कि 'अमरीका को महान बनाना' चीनी बाजार और सप्लाई चेन के बिना संभव नहीं है?
वास्तव में इस यात्रा ने दिखाया कि दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे पर कितनी निर्भर हैं। अमरीकी कंपनियां चीन की उत्पादन क्षमता और विशाल उपभोक्ता आधार के बिना अपनी वैश्विक वृद्धि की कल्पना नहीं कर सकतीं, वहीं चीन भी अमरीकी प्रौद्योगिकी और निवेश से लगातार लाभान्वित होता रहा है। ऐसे में ट्रंप का यह दौरा व्यावहारिक जरूरतों का परिणाम अधिक प्रतीत होता है। यात्रा के दौरान अनौपचारिक बातचीत के लिए चुनी गई जगहें भी कई संकेत दे रही थीं। पीपुल्स ग्रेट हॉल में औपचारिक बैठक सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया थी, लेकिन मिंग राजवंश के 600 वर्ष पुराने 'स्वर्ग मंदिर' के माध्यम से शी जिनपिंग ने ट्रंप को चीनी सभ्यता और शासन पद्धति की ऐतिहासिक गहराई से परिचित कराने का प्रयास किया।
जब ट्रंप ने चीन को 'बेहद खूबसूरत' कहा, तो चीनी मीडिया ने इसे चीनी संस्कृति और विकास मॉडल की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति के रूप में प्रस्तुत किया। बातचीत के दौरान शी जिनपिंग ने तीन महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाए। पहला, क्या दोनों देश 'थ्यूसीडाइड्स ट्रैप' से बच सकते हैं, अर्थात क्या दो बड़ी शक्तियां बिना संघर्ष के साथ रह सकती हैं? दूसरा, क्या वे जलवायु परिवर्तन और वैश्विक संकटों पर मिलकर काम कर सकते हैं? और तीसरा, क्या दोनों देश अपने नागरिकों तथा पूरी मानवता की भलाई को प्राथमिकता दे सकते हैं? इन सवालों के जरिए जिनपिंग को एक जिम्मेदार और दूरदर्शी नेता के रूप में पदस्थापित करने की चीनी राजनीतिक और सामरिक सोच झलकती है। वही पूरी यात्रा में ट्रंप काफी संयमित और गंभीर दिखे, जो उनके आमतौर पर जोशीले अंदाज से अलग था। उन्होंने शी जिनपिंग को 'पुराना दोस्त' कहा और रिश्तों की अहमियत पर जोर दिया। इसके पीछे घरेलू राजनीतिक और आर्थिक कारण भी थे। अमरीका में मध्यावधि चुनाव की तैयारी चल रही है, महंगाई से लोग परेशान हैं और व्यापारिक आंकड़ों ने अमरीकी अर्थव्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया है।
ट्रंप यह समझ चुके हैं कि लंबा टकराव अमरीका के लिए भी महंगा साबित हो सकता है। शी जिनपिंग ने अमरीका-चीन संबंधों के लिए 'रचनात्मक रणनीतिक स्थिरता' का नया ढांचा सामने रखा। इसका अर्थ था कि प्रतिस्पर्धा जारी रहे, लेकिन उसे नियंत्रित रखा जाए और टकराव से बचा जाए। ट्रंप की इस यात्रा ने स्पष्ट कर दिया कि आर्थिक वास्तविकताएं राजनयिक बयानबाजी से कहीं अधिक प्रभावी होती हैं। चीन की तेज विकास दर, तकनीकी प्रगति और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में उसकी केंद्रीय भूमिका को अमरीका नजरअंदाज नहीं कर सका। वहीं ट्रंप प्रशासन भी घरेलू आर्थिक दबावों के कारण चीन के साथ व्यावहारिक संबंध बनाए रखने की आवश्यकता समझने लगा था। हालांकि ट्रंप की अप्रत्याशित नीतियों और राजनीतिक शैली को देखते हुए अमरीका-चीन संबंधों में किसी बड़े सकारात्मक बदलाव की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी, लेकिन दोनों देशों के बीच एक सीमित ठहराव और संतुलन की संभावना अवश्य दिखाई देती है।