यदि चुनाव आयोग को लगता है कि कोई व्यक्ति वैध नागरिक नहीं है और इस वजह से उसका नाम 2003 की सूची से हटा दिया गया है, तो उसे इस मामले को नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत सक्षम प्राधिकारी के पास भेजना चाहिए, जो अगले चुनाव से पहले इस बारे में कोई निर्णय ले।
सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करते हुए जो फैसला सुनाया है, वह चुनाव आयोग की शक्तियों को नई रोशनी में देखने और उसे बल प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण साबित हो सकता है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए समय-समय पर मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की शक्ति चुनाव आयोग के पास है। हालांकि मतदाता सूचियों से हटाए गए लोगों की रक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के सामने एक लक्ष्मण रेखा भी खींच दी कि नागरिकता तय करने के मामले में उसकी शक्ति सीमित है। उसके अधिकार सिर्फ मतदाता सूची में नाम शामिल करने या हटाने तक ही रहेंगे। सूची से हटाए गए लोगों को विदेशी नहीं माना जाएगा। वे इसको लेकर अपील कर सकेंगे और सूची में फिर से नाम शामिल करवा सकेंगे।
इसी के साथ सर्वोच्च अदालत ने पहली बार मताधिकार को 'केवल वैधानिक' ही नहीं, 'संवैधानिक अधिकार' के रूप में मान्यता दी है, जो पारंपरिक स्थिति से अलग है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए। दशकों तक, सुप्रीम कोर्ट ने मतदान को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत सिर्फ एक 'वैधानिक अधिकार' माना, जिससे संसद और चुनाव आयोग को इसके तौर-तरीके और शर्तें तय करने का व्यापक अधिकार और विवेक मिल गया था। संवैधानिक अधिकार माने जाने के बाद अब अदालत को कानून से होने वाली किसी परेशानी में हस्तक्षेप करने का मौका मिल सकेगा। हालांकि, एसआइआर पर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला चुनाव आयोग के निर्णय को गलत साबित करने की जिम्मेदारी नागरिकों को सौंपने जैसा है जबकि, होना यह चाहिए कि किसी व्यक्ति को मतदाता सूची से हटाने के फैसले को सही साबित करने की जिम्मेदारी आयोग निभाए और नाम हटाने से पहले उसकी व्यापक जांच का काम सरकार को सौंपा जाए। आखिर चुनाव आयोग का काम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है न कि नाम हटाकर नागरिकों को और परेशानी में डाल देना। यदि चुनाव आयोग को लगता है कि कोई व्यक्ति वैध नागरिक नहीं है और इस वजह से उसका नाम 2003 की सूची से हटा दिया गया है, तो उसे इस मामले को नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत सक्षम प्राधिकारी के पास भेजना चाहिए, जो अगले चुनाव से पहले इस बारे में कोई निर्णय ले।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला चुनाव आयोग की संवैधानिक शक्ति को विशेषाधिकार देता है, जबकि मतदाता के संवैधानिक अधिकार को कमतर आंकते हुए प्रतीत हो रहा है। यही वह बिंदु है जहां अब भी विवाद की गुंजाइश बची रह जाती है। अब देखना होगा कि यह मामला आगे क्या रुख लेता है। केंद्र सरकार, चुनाव आयोग,न्यायपालिका को मिलकर ऐसी पारदर्शी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें किसी भी वैध नागरिक को तकनीकी कारणों से अपने नागरिक अधिकारों के लिए परेशानी का सामना नहीं करना पड़े।