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आम आदमी कुछ नहीं? प्रेगनेंट पत्नी को ले जा रहे पति ने सड़क पर दिया धरना, गर्वनर के लिए ट्रैफिक रोकने पर जताया गुस्सा

बेंगलुरु में गर्वनर के काफिले के लिए ट्रैफिक रोके जाने से नाराज एक व्यक्ति अपनी प्रेगनेंट पत्नी के साथ सड़क पर बैठ गया। घटना का वीडियो वायरल है और VIP कल्चर पर नई बहस छिड़ गई है।

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सड़क पर धरने पर बैठा व्यक्ति (फोटो - Deepak Bopanna एक्स पोस्ट)

बेंगलुरु में VIP मूवमेंट के दौरान ट्रैफिक रोकने को लेकर एक घटना ने आम नागरिकों की परेशानियों और VIP कल्चर पर नई बहस छेड़ दी है। शहर के ओल्ड एयरपोर्ट रोड पर कर्नाटक के गर्वनर थावरचंद गहलोत के काफिले के गुजरने के लिए यातायात को अस्थायी रूप से रोक दिया गया था। इसी दौरान अपनी प्रेगनेंट पत्नी के साथ यात्रा कर रहा एक व्यक्ति लंबे समय तक ट्रैफिक में फंसने के कारण नाराज हो गया और विरोध स्वरूप सड़क के बीचोंबीच बैठ गया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

सड़क पर बैठकर विरोध शुरू किया

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, व्यक्ति अपनी गर्भवती पत्नी के साथ किसी जरूरी काम से जा रहा था। ट्रैफिक रुकने के कारण उसे काफी देर तक इंतजार करना पड़ा। नाराज व्यक्ति ने सड़क पर बैठकर विरोध शुरू कर दिया और कहा कि उसकी पत्नी प्रेगनेंट है तथा उन्हें भी जरूरी काम पर पहुंचना है। उसने सवाल उठाया कि यदि गर्वनर VIP हैं तो क्या आम नागरिकों की कोई अहमियत नहीं है। उसका कहना था कि आम लोगों का समय भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी जनप्रतिनिधि या उच्च पदाधिकारी का।

पुलिस और व्यक्ति के बीच हुई बहस

वायरल वीडियो में ट्रैफिक पुलिस के एक अधिकारी को व्यक्ति को वहां से हटाने की कोशिश करते हुए देखा जा सकता है। अधिकारी ने उसे बार-बार उठकर किनारे जाने को कहा, लेकिन व्यक्ति अपनी बात पर अड़ा रहा। जब पुलिसकर्मी ने कहा कि आप भी VIP हैं, अब उठ जाइए, तब भी उसने मना कर दिया। दोनों के बीच कुछ देर तक तीखी बहस चलती रही। हालांकि बाद में स्थिति सामान्य हो गई और व्यक्ति वहां से चला गया। यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि आखिरकार गतिरोध कैसे समाप्त हुआ।

VIP कल्चर पर फिर शुरू हुई बहस

यह घटना ऐसे समय सामने आई है जब देश में VIP कल्चर को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंत्रियों और अधिकारियों से सरकारी प्रोटोकॉल में सादगी अपनाने और अनावश्यक दिखावे से बचने की अपील की थी। उन्होंने सरकारी काफिलों और व्यवस्थाओं को अधिक व्यावहारिक तथा जनसुविधा के अनुकूल बनाने पर भी जोर दिया था। बेंगलुरु की यह घटना एक बार फिर इस सवाल को सामने लाती है कि सुरक्षा और प्रोटोकॉल के बीच आम नागरिकों की सुविधा और समय को किस तरह संतुलित किया जाए।