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Fire Safety Crisis: 60 लाख आबादी वाले लखनऊ में सिर्फ 8 फायर स्टेशन, बढ़ा बड़े हादसों का खतरा

Fire Safety Crisis UP: 60 लाख आबादी वाले लखनऊ में एनबीसी मानकों के अनुसार 30 फायर स्टेशन जरूरी हैं, लेकिन शहर में केवल आठ फायर स्टेशन होने से सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

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Lucknow Fire Safety Crisis: संसाधनों और कर्मचारियों की भारी कमी के बीच आग से जंग लड़ रहे दमकल कर्मी (फोटो सोर्स : भाषा WhatsApp News Group

Fire Safety Crisis Awareness: राजधानी लखनऊ का तेजी से विस्तार कर रहा महानगर है। ऊंची इमारतें, बड़े कारोबारी कॉम्प्लेक्स, घनी आबादी वाले बाजार और लगातार बढ़ती रिहायशी कॉलोनियां शहर की पहचान बन चुकी हैं। लेकिन शहर की सुरक्षा व्यवस्था का एक बेहद चिंताजनक पक्ष सामने आ रहा है। भारतीय भवन निर्माण संहिता (एनबीसी) 2016 के मानकों के अनुसार जहां करीब 60 लाख की आबादी वाले लखनऊ में कम से कम 30 फायर स्टेशनों की आवश्यकता है, वहीं वर्तमान में पूरे शहर में केवल आठ फायर स्टेशन ही संचालित हो रहे हैं। संसाधनों और कर्मचारियों की भारी कमी के बावजूद दमकल विभाग के जवान दिन-रात लोगों की जान और संपत्ति बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

राजधानी में बढ़ती आगजनी की घटनाओं के बीच यह सवाल लगातार गंभीर होता जा रहा है कि आखिर इतने बड़े शहर की सुरक्षा केवल सीमित संसाधनों के सहारे कब तक संभव होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते फायर सेवाओं का विस्तार नहीं किया गया तो आने वाले समय में स्थिति और भयावह हो सकती है।

एनबीसी मानक और लखनऊ की वास्तविकता

भारतीय भवन निर्माण संहिता (एनबीसी) 2016 के अनुसार प्रत्येक दो लाख की आबादी अथवा पांच से सात किलोमीटर की परिधि में एक फायर स्टेशन होना अनिवार्य माना गया है। इस मानक के हिसाब से लखनऊ जैसे महानगर में कम से कम 30 फायर स्टेशन होने चाहिए।

लेकिन हकीकत यह है कि राजधानी में वर्तमान समय में केवल हजरतगंज, चौक, गोमती नगर, पीजीआई, इंदिरा नगर, आलमबाग, सरोजनीनगर और बीकेटी में ही फायर स्टेशन संचालित हो रहे हैं। इसके अलावा राजभवन और हाईकोर्ट में रिजर्व फायर स्टेशन मौजूद हैं, जो विशेष परिस्थितियों के लिए आरक्षित रहते हैं। इतनी सीमित व्यवस्था के कारण शहर के कई इलाकों में आग लगने की घटनाओं के दौरान दमकल वाहनों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। ट्रैफिक जाम और संकरी सड़कों के कारण कई बार राहत कार्य प्रभावित होता है और आग पर काबू पाने में देरी हो जाती है।

तेजी से फैलता शहर, नहीं बढ़े संसाधन

लखनऊ का विस्तार पिछले एक दशक में अत्यधिक तेजी से हुआ है। गोमती नगर विस्तार, शहीद पथ, सुल्तानपुर रोड, किसान पथ और सीतापुर रोड के आसपास नई टाउनशिप और बहुमंजिला इमारतों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

इसके बावजूद दमकल विभाग के संसाधनों और फायर स्टेशनों की संख्या में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो सकी। शहर के बाहरी क्षेत्रों में कई ऐसी कॉलोनियां हैं जहां आग लगने पर दमकल वाहन पहुंचने में 30 से 40 मिनट तक का समय लग जाता है। सूत्रों  का कहना है कि किसी भी आगजनी की घटना में शुरुआती 10 से 15 मिनट सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। यदि इसी समय में राहत कार्य शुरू न हो पाए तो नुकसान कई गुना बढ़ सकता है।

कम संसाधनों में जान जोखिम में डाल रहे दमकल कर्मी

दमकल विभाग के कर्मचारी सीमित संसाधनों और स्टाफ की कमी के बावजूद लगातार चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में काम कर रहे हैं। विभाग के पास उपलब्ध कर्मचारियों की संख्या भी मानकों के अनुरूप नहीं है।गर्मी के मौसम में आग की घटनाएं बढ़ने पर स्थिति और गंभीर हो जाती है। कई बार एक ही समय पर शहर के अलग-अलग हिस्सों में आग लगने की सूचना मिलती है, जिससे उपलब्ध संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

दमकल कर्मियों का कहना है कि कई बार उन्हें लगातार घंटों तक बिना रुके राहत कार्य करना पड़ता है। ऊंची इमारतों में आग लगने की घटनाओं के दौरान जोखिम कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि पर्याप्त हाईटेक उपकरण और आधुनिक तकनीक हर समय उपलब्ध नहीं हो पाती।

पुराने बाजार सबसे ज्यादा संवेदनशील

राजधानी के पुराने और घनी आबादी वाले बाजार दमकल विभाग के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं। अमीनाबाद, चौक, नक्खास, यहियागंज और हुसैनगंज जैसे क्षेत्रों में संकरी गलियां और अव्यवस्थित बिजली व्यवस्था आग लगने की घटनाओं को और खतरनाक बना देती है।

इन इलाकों में दमकल वाहनों का प्रवेश कई बार मुश्किल हो जाता है। ऐसे में आग बुझाने के लिए कर्मचारियों को पाइप लाइन बिछाकर दूर से पानी पहुंचाना पड़ता है। इससे राहत कार्य में समय अधिक लगता है और नुकसान बढ़ने की संभावना बनी रहती है। हालांकि अमीनाबाद, गोसाईगंज और महिलाबाद क्षेत्रों में फायर सीजन के दौरान एक-एक दमकल वाहन तैनात किया जाता है, लेकिन विशेषज्ञ इसे पर्याप्त नहीं मानते।

विभाग के पास उपलब्ध आधुनिक उपकरण

सीमित संसाधनों के बावजूद दमकल विभाग के पास कुछ आधुनिक उपकरण उपलब्ध हैं, जिनकी मदद से बड़े हादसों में राहत कार्य किया जाता है। विभाग के पास एक हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म और एक फायर स्केप आर्टिकुलेटेड वाटर टावर मौजूद है, जिनका उपयोग ऊंची इमारतों में आग बुझाने के लिए किया जाता है।

इसके अलावा एक मल्टी डिजास्टर रिस्पांस व्हीकल भी विभाग के पास है, जो विभिन्न प्रकार की आपदाओं में उपयोगी साबित होता है। विभाग के पास 12 हजार लीटर क्षमता वाले दो वाटर बाउजर, आठ बड़े फायर टेंडर और सात छोटे फायर टेंडर मौजूद हैं। फायर क्विक रिस्पांस व्हीकल और हाईप्रेशर वाटर मिस्ड जेनियो वाहन भी आग पर त्वरित नियंत्रण में मदद करते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि महानगर की जरूरतों के हिसाब से यह संख्या अभी भी काफी कम है।

बढ़ते हादसे दे रहे चेतावनी

पिछले कुछ वर्षों में राजधानी में आग लगने की कई बड़ी घटनाएं सामने आ चुकी हैं। अस्पतालों, शोरूम, गोदामों और बहुमंजिला इमारतों में आग लगने से करोड़ों रुपये की संपत्ति नष्ट हो चुकी है। कई मामलों में लोगों की जान भी गई है। जानकार  मानते हैं कि यदि फायर सेफ्टी नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए और दमकल विभाग को पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, तो बड़ी घटनाओं को रोका जा सकता है। लेकिन वर्तमान हालात यह संकेत दे रहे हैं कि शहर की आबादी और संरचनात्मक विस्तार के मुकाबले फायर सुरक्षा व्यवस्था बेहद कमजोर स्थिति में है।

लोगों में जागरूकता भी जरूरी

दमकल अधिकारियों का कहना है कि केवल विभागीय संसाधन बढ़ाने से ही समस्या का समाधान नहीं होगा। लोगों को भी फायर सेफ्टी नियमों के प्रति जागरूक होना होगा। बहुमंजिला इमारतों, मॉल, अस्पतालों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में फायर अलार्म, अग्निशमन यंत्र और इमरजेंसी निकासी व्यवस्था अनिवार्य रूप से सक्रिय रहनी चाहिए। कई बार लापरवाही और सुरक्षा मानकों की अनदेखी बड़े हादसों का कारण बनती है। इसलिए प्रशासन और नागरिकों दोनों को मिलकर सुरक्षा के प्रति गंभीर होना होगा।