कई माताओं के मां बनने की खुशी में थम गईं सांसें, मौत के आंकड़ों में गिरावट, लेकिन जारी है लापरवाही, स्वास्थ्य व्यवस्था पर खड़े हुए सवाल, कमजोर सिस्टम ने छीनी हजारों घरों की खुशियां
बालमीक पांडेय @ कटनी. एक मां नौ महीने तक अपने बच्चे को कोख में सिर्फ जन्म नहीं देती, बल्कि उसके साथ हजारों सपने भी पालती है। परिवार उस नन्हीं किलकारी के इंतजार में भविष्य के रंग सजाता है, लेकिन जिले की तस्वीर इन उम्मीदों को झकझोर देने वाली है। यहां जन्म लेते ही हजारों मासूम जिंदगी की जंग हार रहे हैं व माताएं काल कलवित हो रही हैं। 25 मर्द को खोहरी गांव निवासी प्रसूता सरिता सिंह व नवजात की मौत ने फिर निगरानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बीते 13 वर्षों में जिले में 10622 नवजातों की और 544 गर्भवती व प्रसूताओं की मौत ने स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत उजागर कर दी है। ये आंकड़े सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड नहीं, बल्कि उन परिवारों का दर्द हैं, जिनके आंगन में खुशियां आने से पहले ही मातम पसर गया। सैकड़ों माताओं ने प्रसव या उससे जुड़ी जटिलताओं के कारण अपनी जान गंवा दी। हर मौत अपने पीछे बेसहारा बच्चों, टूटे परिवारों और अनगिनत सवालों को छोड़ गईं…।
विशेषज्ञों के अनुसार नवजात मौतों की सबसे बड़ी वजह बर्थ एस्फिक्सिया यानी जन्म के समय बच्चे को पर्याप्त ऑक्सीजन न मिल पाना है। इसके अलावा समय पर इलाज न मिलना, प्रसव में लापरवाही, प्रशिक्षित स्टॉफ की कमी और गंभीर मामलों को देर से रेफर करना भी मौतों का बड़ा कारण बन रहा हैं। महिलाओं की भी सही देखभाल न होना है। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों व सुविधाओं का अभाव है। सरकार द्वारा मातृ एवं शिशु मृत्यु दर कम करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। सुरक्षित प्रसव, जननी सुरक्षा, पोषण अभियान और नवजात देखभाल जैसी योजनाएं संचालित हैं। लेकिन जमीनी हालात इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आते हैं।
वहीं दूसरी ओर प्रदेश सरकार के उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला ने भी स्वास्थ्य सुविधाओं व मेन पॉवर को लेकर समक्षा की है। विभाग के अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए हैं। चिकित्सकों व विशेषज्ञ चिकित्सकों की भर्ती को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही है।
वर्ष गर्भवती/प्रसूता बच्चा 5 साल तक मौत
2014-15 21 741 20
2015-16 22 607 26
2016-17 34 561 25
2017-18 51 957 43
2018-19 47 998 45
2019-20 51 1138 48
2020-21 52 959 41
2021-22 48 747 37
2022-23 64 920 39
2023-24 64 1221 54
2024-25 52 873 59
2025-26 35 763 55
2026-27 03 137 00
जन्म लेने के पांच साल तक बच्चों को खतरा बना रहता है। अंडर-5 वर्ष तक 11 वर्ष में जिले में 492 बच्चे काल कलवित हो चुके हैं। हैरानी की बात तो यह है कि मौत का आंकड़ा कम होने की बजाय बढ़ा है। जिले में बच्चों के मौत की मुख्य वजह निमोनिया, इंफेक्शन, डिहाइड्रेशन, हाइ फीवर, सेप्सिस, बर्थ एक्सपेक्सिया, बच्चों को दूध पिलाने के बाद डकार न दिलाने के कारण मौत हो रही है। इसके लिए न तो स्वास्थ्य विभाग जागरुक हो रहा है और ना ही परिजन।
जिले में महिलाओं की सेहत के साथ बड़ी अनदेखी हो रही है। महिलाओं में पीपीएच, पीआइएच, एकलेम्सिया, कार्डियक अरेस्ट, एनीमिया, शॉक के कारण मौत हो रही है। लापरवाही मातृ मृत्यु दर में घरों में लापरवाही होती है। लोग समय पर जांच नहीं कराते, जांच के बाद जो उपचार बताया जाता है वह परिजन इलाज नहीं कराते। 70 फीसदी महिलाओं में एनीमिया होता है, इससे गर्भवती महिलाओं की समस्या और भी बढ़ जाती है। कई प्रकार के साइड इफेक्ट होते हैं। इसी प्रकार स्वास्थ्य फील्ड लेवर पर समय पर सही जांच नहीं होती, काउंसलिंग नहीं हो पाती, जागरूकता की कमी बनी हुई है, निगरानी में भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
कटनी जिला अस्पताल में समस्याएं अब एकदम आम हो चली हैं। यहां मरीज ओपीडी पर्ची कटाने से लेकर चिकित्सक को दिखाने और जांच कराने सहित दवाएं प्राप्त करने में परेशान होता है। रिपोर्ट लेट से मिलना, समय पर दवाएं न मिलना यहां की परिपाटी बन चुकी है। लाइन में लगना यहां की परंपरा सी हो चली है।
जिले में मातृ मृत्यु दर व शिशु मृत्यु दर का सूचकांक प्रदेश व देश से काफी अधिक है। मातृ मृत्युदर में 2014-16 के एसआरएस रिपोर्ट में देश का प्रतिशत 171, प्रदेश का 130 रहा है जबकि कटनी में एएचएस सर्वे 2012-13 में 239 रहा है। इसी प्रकार शिशु मृत्युदर में प्रदेश व देश का एसआरएस रिपोर्ट 43-34 रही है, जबकि कटनी में 65 रही है। अभी हाल में एसआरएस रिपोर्ट जारी हुई है उसमें भी कटनी में बहुत ज्यादा सुधार नहीं है। हाल ही में रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया द्वारा जारी एसआरएस बुलेटिन 2022 के सर्वे के अनुसार है जो चिंताजनक है। वर्तमान में एक हजार बच्चों में 35 बच्चों की मौत हो रही है, जबकि एक लाख प्रसव पर 135 महिलाएं दम तोड़ रही हैं।
जिले में पिछले कुछ वर्षों की तुलना में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर कम हुई है। लगातार सुधार हो रहा है। निगरानी तंत्र को और मजबूत किया जाएगा। मौतों के आंकड़े को कम करने गर्भवती महिलाओं व बच्चों की विशेष देखरेख कराई जाएगी।