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Jalore: रिटायर्ड नायब हवलदार ने बंजर खेत को बनाया हरियाली का मॉडल, 5 वर्ष में उगाया चंदन का जंगल

Sandalwood Farming Rajasthan: देश की सीमाओं की रक्षा करने के बाद अब एक सेवानिवृत्त सैनिक अपने गांव में हरियाली की नई इबारत लिख रहे हैं। सायला क्षेत्र के बावतरा गांव निवासी सेवानिवृत्त नायब हवलदार गणपत राजपुरोहित ने पाऊ राेड पर वाकिया स्टेशन के पास अपने खेत को चंदन और नींबू के पौधों से विकसित कर पर्यावरण संरक्षण, जल बचत और प्राकृतिक खेती का ऐसा मॉडल तैयार किया है।

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रिटायर्ड नायब हवलदार गणप​त राज​पुरोहित ने बंजर खेत में उगाई चंदन की खेती, पत्रिका फोटो

Sandalwood Farming Rajasthan: देश की सीमाओं की रक्षा करने के बाद अब एक सेवानिवृत्त सैनिक अपने गांव में हरियाली की नई इबारत लिख रहे हैं। सायला क्षेत्र के बावतरा गांव निवासी सेवानिवृत्त नायब हवलदार गणपत राजपुरोहित ने पाऊ राेड पर वाकिया स्टेशन के पास अपने खेत को चंदन और नींबू के पौधों से विकसित कर पर्यावरण संरक्षण, जल बचत और प्राकृतिक खेती का ऐसा मॉडल तैयार किया है, जो क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है।

वर्ष 2021 में जालोर जिले में शुरू की गई यह पहल आज एक छोटे से प्रयोग से आगे बढ़कर हरियाली के सुंदर उदाहरण के रूप में सामने आई है। खेत में लगाए गए सफेद चंदन के पौधे अब तेजी से विकसित होकर घनी झाड़ियों और छोटे वृक्षों का रूप लेने लगे हैं। कभी बंजर दिखाई देने वाला खेत अब दूर से ही हरियाली का संदेश देता नजर आता है।

मणिपुर में देखी सफेद चंदन की खेती

गणपत राजपुरोहित बताते हैं कि सेना में सेवा के दौरान उनकी नियुक्ति मणिपुर में रही थी। वहां उन्होंने पहली बार बड़े स्तर पर सफेद चंदन के पेड़ देखे थे। चंदन के आर्थिक और पर्यावरणीय महत्व को समझने के बाद उनके मन में विचार आया कि सेवानिवृत्ति के बाद अपने गांव में भी इस दिशा में काम किया जाए। नौकरी से निवृत्त होने के बाद उन्होंने इस सपने को साकार करने का संकल्प लिया और गुजरात से कर्नाटक नस्ल के सफेद चंदन के पौधे मंगवाकर अपने खेत में रोपित किए।

प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल

गणपत राजपुरोहित ने बताया कि शुरुआत में कई लोगों को यह प्रयोग जोखिम भरा लगा, लेकिन उन्होंने धैर्य और लगन के साथ पौधों की देखभाल जारी रखी। आज पांच वर्षों की मेहनत के बाद पौधों की अच्छी वृद्धि ने उनके विश्वास को मजबूत किया है। चंदन की खेती जहां पर्यावरण के लिए लाभकारी है, वहीं किसानों के लिए भविष्य में बेहतर आय का माध्यम भी बन सकती है।

चंदन के साथ-साथ उन्होंने खेत में करीब 300 नींबू के पौधे भी लगाए हैं। विशेष बात यह है कि खेती में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग नहीं किया जाता। पेड़ों की गिरी हुई पत्तियों, गोबर और जैविक पदार्थों से तैयार प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल कर मिट्टी की उर्वरता बनाए रखी जा रही है। इससे उत्पादन के साथ-साथ पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है।

दीर्घकालिक निवेश का बेहतर विकल्प

गणपत राजपुरोहित के अनुसार सफेद चंदन का उपयोग आयुर्वेदिक औषधियों, इत्र, अगरबत्ती और विभिन्न सौंदर्य प्रसाधनों के निर्माण में किया जाता है। देश की कई हर्बल और औषधि कंपनियां चंदन की खरीद में रुचि रखती हैं। गुणवत्ता और मांग के अनुसार इसकी कीमत हजारों रुपये प्रति किलो तक पहुंच सकती है।

ऐसे में यह फसल किसानों के लिए दीर्घकालिक निवेश का बेहतर विकल्प साबित हो सकती है।जल संरक्षण के क्षेत्र में भी उनका प्रयास उल्लेखनीय है। उन्होंने पूरे खेत में ड्रिप इरिगेशन प्रणाली अपनाई है, जिससे पानी की काफी बचत होती है। कम पानी में अधिक पौधों की सिंचाई कर वे किसानों को जल प्रबंधन का व्यावहारिक संदेश दे रहे हैं।

इनका कहना है…

बदलते समय में किसानों को पारंपरिक खेती के साथ ऐसी खेती को भी अपनाना चाहिए जो पर्यावरण के अनुकूल हों और भविष्य में बेहतर आर्थिक लाभ दे सकें। दृढ़ इच्छाशक्ति और सकारात्मक सोच से कोई भी व्यक्ति समाज में बदलाव की नई मिसाल कायम कर सकता है। चंदन का बगीचा न केवल हरियाली का प्रतीक है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति संरक्षण और जल बचत का जीवंत संदेश भी बन गया है।

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