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Success Story: इंटरव्यू में 50 बार फेल, पर नहीं डिगा हौसला, आज एक दिग्गज कंपनी के हैं मालिक

Success Story:50 इंटरव्यू में रिजेक्ट हुआ एक युवक आज हजारों करोड़ की कंपनी का मालिक है। तमिलनाडु के छोटे से गांव से निकलकर डॉ. ए. वेलुमणि ने गरीबी, संघर्ष और असफलताओं को अपनी ताकत बनाया और थायरोकेयर जैसी दिग्गज कंपनी खड़ी कर दी।

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डॉक्टर ए वेलुमणि।PC: velumani.com

तमिलनाडु की जुबां पर फिलहाल एक ही नाम है- जोसेफ विजय। राजनीति में आया एक ‘यंग टर्क’ किस तरह धुरंधर नेताओं को मात दे गया, हर कोई यह जानना चाहता है। विजय की जीत एक केस स्टडी बन गई है। ठीक इसी तरह दशकों पहले गांव से निकले एक गरीब युवक के सफलता की ऊंचाई पर पहुंचने की कहानी ने भी सबको चौंकाया था। गरीबी से जंग, हालातों से दो-दो हाथ, और हर बाधा को लांघकर आगे बढ़ना- उनकी कहानी आज भी लोगों को संघर्ष का सामना करने की प्रेरणा देती है।

गरीबी में बीता बचपन, लेकिन सपने रहे बड़े

Dr A Velumani, Founder of Thyrocare: आज हम बात कर रहे हैं डॉ. ए. वेलुमणि की,  जो तमिलनाडु के एक छोटे से गांव में रहते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति खास अच्छी नहीं थी, बस किसी तरह गुजर-बसर चल रहा था। लेकिन उन्हें यह विश्वास था कि हालात बदलेंगे और इस विश्वास ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा थी- आज वह फार्मा सेक्टर की दिग्गज कंपनी थायरोकेयर (Thyrocare) के मालिक हैं।

मां ने परिवार को संभाला

डॉ. वेलुमणि के पिता अपनी ज़मीन छिन जाने के बाद गरीबी के दलदल में फंस गए थे। लेकिन उनकी मां-जो बेहद स्वाभिमानी और स्वतंत्र विचारों वाली महिला थीं, अपने परिवार का मज़बूत सहारा बनीं। केवल दो भैंसों का दूध बेचकर रोजाना होने वाली महज 10 रुपए की कमाई से अपने 5 बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाई। उन्होंने कभी किसी से एक रुपया भी उधार नहीं लिया और इस तरह उन्होंने वेलुमणि को वित्तीय अनुशासन और सम्मान का पहला पाठ सिखाया। डॉ. वेलुमणि शुरू से ही पढ़ाई में अच्छे थे। 12वीं क्लास में उन्हें 200 में से 200 नंबर आए थे। इसलिए वेलुमणि की मां ने आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उनकी पढ़ाई जारी रखी और उन्होंने भी कभी निराश नहीं किया।

पढ़ाई के बाद असली परीक्षा

साइंस की डिग्री लेने के बाद वेलुमणि को लगा कि अब सबकुछ ठीक हो जाएगा, लेकिन अभी उनकी असली परीक्षा बाकी थी। उन्हें लगातार रिजेक्शन का सामना करना पड़ा। इंडस्ट्रियल शहर कोयंबटूर में उन्होंने 50 इंटरव्यू दिए और सभी भी फेल हो गए। ऐसे कठिन समय में अधिकांश युवा निराशा के अंधेरे में घिर जाते हैं, लेकिन वेलुमणि ने ऐसा नहीं होने दिया। वह बेशक दुखी हुए, मगर निराश नहीं। उन्होंने यह पाया कि अनुभव की कमी के चलते उन्हें नौकरी नहीं मिली और यहीं से अपनी कंपनी खड़ी करने के विचार ने जन्म लिया। उन्होंने ठान लिया कि वे एक दिन ऐसी कंपनी बनाएंगे, जो सिर्फ़ फ्रेशर्स को नौकरी देगी।

जमी-जमाई सरकारी नौकरी छोड़ी

इस बीच, मुंबई में BARC (Bhabha Atomic Research Centre) में उन्हें सरकारी नौकरी मिल गई और लाइफ में स्थिरता आई। लेकिन डॉ. वेलुमणि के दिमाग में अपनी कंपनी शुरू करने का विचार तब भी जिंदा रहा। इस दौरान, वह लगातार खुद को अपग्रेड करते रहे। एक बार इंटरव्यू में थायरॉइड ग्लैंड से जुड़े एक सवाल पर वे अटक गए थे, क्योंकि उन्होंने कभी बायोलॉजी नहीं पढ़ी थी। लिहाजा, उन्होंने बायोकेमिस्ट्री में PhD कर ली, जिसमें उनकी विशेषज्ञता थायरॉइड में थी। 1995 में, 2 लाख रुपए की बचत के साथ उन्होंने एक ऐसा कदम उठाया जो आमचलन के विरुद्ध था। उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उसी रात उन्होंने अपनी बैंकर पत्नी को अपनी योजना के बारे बताया, वाइफ ने भी उनका पूरा साथ दिया।

गरीबी दो ही विकल्प देती है

1996 में उन्होंने एक ज़बरदस्त सोच के साथ अपनी कंपनी  की शुरुआत की। उन्होंने देखा कि बाहर से मंगाए गए मेडिकल रीएजेंट (मेडिकल रिएजेंट खास तरह के केमिकल या बायोलॉजिकल पदार्थ होते हैं, जिनका इस्तेमाल लैबोरेटरी टेस्ट में किया जाता है) की कीमत 50 रुपए होती है, लेकिन अगर उन्हें यहीं बनाया जाए, तो कीमत घटकर महज 3 रुपए हो सकती है। उन्होंने इस किफ़ायती मॉडल को अपनी मां से सीखी बचत की आदत के साथ जोड़ा  और बिना कोई कर्ज या बाहरी निवेश के एक बड़ा बिज़नेस खड़ा कर दिया। डॉ. ए. वेलुमणि अक्सर कहते हैं कि गरीबी आपके सामने दो विकल्प रखती है- इसे एक अभिशाप मानना या इसे एक अवसर के रूप में देखना। अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप कौनसा विकल्प चुनते हैं। मैंने उसे एक अवसर के रूप में देखा।