# कारोबार

Plastic Currency: मनमोहन सरकार के प्लान पर अमल करने की सोच रही मोदी सरकार, आपके हाथ में जल्द आ सकते हैं नए तरह के नोट

Plastic Banknotes: भारतीय रिजर्व बैंक देश में पॉलिमर यानी प्लास्टिक बैंक नोटों को चलन में लाने के आइडिया पर काम कर रहा है। नोट छापने की बढ़ती लागत और नकदी की बढ़ती मांग को देखते हुए RBI जल्द ही पायलट प्रोजेक्ट शुरू कर सकता है।

3 min read
जल्द ही Plastic Currency मार्केट में आ सकती है। (PC: AI)

Polymer Banknotes: भारत में भले ही डिजिटल पेमेंट का दायरा काफी बढ़ गया हो, लेकिन कैश की डिमांड कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) प्लास्टिक के नोटों (Polymer Banknotes) को चलन में लाने के आइडिया पर काम कर रहा है। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक रहा तो जल्द ही आम लोगों के हाथ में पॉलिमर यानी प्लास्टिक से बने नोट दिखाई दे सकते हैं। हालांकि, यह आइडिया नया नहीं है। साल 2012 में तत्कालीन मनमोहन सरकार ने भी इस आइडिया पर काम किया था, लेकिन प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ सकता था

बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया कि RBI की हालिया बोर्ड बैठकों में पॉलिमर नोटों का मुद्दा गंभीरता से उठाया गया है। इसके पीछे मुख्य वजह करेंसी नोट छापने की बढ़ती लागत और उनकी कम लाइफ है। आरबीआई का मानना है कि प्लास्टिक के नोट लंबे समय तक चलेंगे और इन्हें बनाने का खर्च भी समय के साथ कम हो सकता है।

लगातार बढ़ रहा नोट छापने का खर्च

आरबीआई की सालाना रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में कागजी नोटों की छपाई पर 6,372.8 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। इससे पिछले वित्त वर्ष में यह खर्च 5,101.4 करोड़ रुपये था। यानी सिर्फ एक साल में ही लागत में बड़ा उछाल आ गया। यही वजह है कि अब केंद्रीय बैंक ऐसे विकल्प तलाश रहा है, जो लंबे समय में खर्च कम कर सकें। पॉलिमर नोट इस दिशा में एक मजबूत विकल्प माने जा रहे हैं।

गंदे और फटे नोट भी बने चिंता की वजह

भारत में हर साल बड़ी संख्या में पुराने और खराब हो चुके नोटों को नष्ट करना पड़ता है। वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 23.8 अरब खराब नोटों को चलन से बाहर किया गया। यह आंकड़ा पिछले साल के मुकाबले 12.3 फीसदी ज्यादा है। इनमें सबसे ज्यादा 500 रुपये और उसके बाद 100 रुपये के नोट शामिल रहे। एक्सपर्ट्स का कहना है कि प्लास्टिक के नोट कागज के मुकाबले ज्यादा टिकाऊ होते हैं। इसलिए इनके जल्दी खराब होने की संभावना कम रहती है।

डिजिटल पेमेंट बढ़ा, फिर भी कैश की डिमांड में आई तेजी

एक तरफ यूपीआई और अन्य डिजिटल पेमेंट्स का इस्तेमाल रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रहा है, वहीं दूसरी तरफ नकदी की मांग भी लगातार बढ़ रही है। 15 मई तक देश में चलन में मौजूद कुल नकदी 42.86 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। सिर्फ वित्त वर्ष 2026-27 के शुरुआती डेढ़ महीने में ही इसमें 1.15 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह दिखाता है कि इंडियन इकोनॉमी में कैश की जरूरत अभी भी बनी हुई है।

छोटे नोटों की मांग बढ़ी

आरबीआई के सामने एक और चुनौती छोटे मूल्य वर्ग के नोटों की उपलब्धता है। पिछले कुछ वर्षों में 10 और 20 रुपये के नोटों की डिमांड लगातार बनी रही, लेकिन कुल चलन में मौजूद नोटों के मूल्य में इनकी हिस्सेदारी बेहद कम है। 10 रुपये के नोट की हिस्सेदारी करीब 0.7 फीसदी और 20 रुपये के नोट की करीब 0.8 फीसदी रही। केंद्रीय बैंक ने छोटे लेनदेन के लिए सिक्कों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की कोशिश की थी। वित्त वर्ष 2025 में सिक्कों की सप्लाई बढ़ाकर करीब 1.5 अरब की गई, जबकि एक साल पहले यह 1.2 अरब थी। इसके बावजूद आम लोगों के बीच नोटों की मांग कम नहीं हुई है।

2012 में भी हुई थी कोशिश

प्लास्टिक नोटों का आइडिया नया नहीं है। साल 2012 में तत्कालीन मनमोहन सरकार ने पांच शहरों में 10 रुपये के पॉलिमर नोटों का परीक्षण करने की योजना बनाई थी। हालांकि, तकनीकी चुनौतियों और ATM से जुड़ी समस्याओं के कारण यह प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ सका। अब हालात बदल चुके हैं। तकनीक काफी विकसित हो गई है और एटीएम मशीनों को भी ऐसे नोटों के अनुरूप तैयार किया जा सकता है। इसलिए जल्द ही पायलट प्रोजेक्ट की औपचारिक घोषणा हो सकती है।

इन देशों में चल रहे प्लास्टिक के नोट

दुनिया के करीब 60 देशों में पॉलिमर बैंक नोट इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने 1988 में सबसे पहले प्लास्टिक नोट जारी किए थे। इसके बाद सिंगापुर, इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलेशिया, रोमानिया और कनाडा जैसे देशों ने भी इन्हें अपनाया है।