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Crude Oil और Rupee के बाद एक और मोर्चे पर मुसीबत के बादल, El Nino से पूरी इकोनॉमी पर पड़ सकता है असर

Indian Economy: Zerodha के नितिन कामथ ने चेतावनी दी है कि अगर 2026 में अल नीनो की वजह से मानसून कमजोर रहा और ईरान संकट के चलते कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो भारत में महंगाई तेजी से बढ़ सकती है।

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El Nino Effect: इस बार बारिश सामान्य से कम रह सकती है। (PC: AI)

El Nino Effect: भारत के लिए साल 2026 आर्थिक मोर्चे पर आसान नहीं रहने वाला है। जेरोधा के को-फाउंडर नितिन कामथ ने चेतावनी दी है कि अगर इस साल मानसून कमजोर रहा और साथ में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो देश में महंगाई बेलगाम हो सकती है। हालात ऐसे बने तो भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI को ब्याज दरें बढ़ाने का कदम उठाना पड़ सकता है। ब्याज दर बढ़ने का मतलब है महंगा लोन और ऊंची ईएमआई।

एक साथ आ रहीं कई मुसीबतें

नितिन कामथ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि हालात एक साथ कई मुसीबतों जैसे बनते जा रहे हैं। उनका कहना है कि अल नीनो की वजह से इस बार सामान्य से कम बारिश होने का खतरा बढ़ गया है। मौसम विभाग ने भी साल 2026 में सामान्य से करीब 6 फीसदी कम बारिश का अनुमान जताया है।

क्या होता है अल नीनो?

कामथ ने समझाया कि अल नीनो वह स्थिति होती है जब प्रशांत महासागर का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है। इसका असर भारत के मानसून पर पड़ता है और बारिश कमजोर हो जाती है। देखने में 6 फीसदी की कमी छोटी लग सकती है, लेकिन भारत जैसे देश के लिए इसका असर काफी बड़ा हो सकता है। दरअसल, देश की करीब 70 फीसदी सालाना बारिश मानसून के दौरान ही होती है। वहीं, आज भी लगभग 60 फीसदी किसान खेती के लिए सिंचाई नहीं, बल्कि बारिश पर निर्भर हैं। ऐसे में कमजोर मानसून सीधे खेती और ग्रामीण आय पर चोट करता है।

कामथ ने कहा कि अगर इतिहास को देखें तो अल नीनो वाले कई साल भारत के लिए मुश्किल साबित हुए हैं। 1951 के बाद से करीब 60 फीसदी अल नीनो वर्षों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। उन्होंने 2009 का उदाहरण भी दिया, जब मानसून 37 साल में सबसे कमजोर रहा था और बारिश सामान्य औसत के सिर्फ 78 फीसदी तक सिमट गई थी।

बारिश कम रही तो बढ़ेगी महंगाई

कम बारिश का सबसे ज्यादा असर चावल, दाल, चीनी और सब्जियों जैसी फसलों पर पड़ता है। जब उत्पादन घटता है, तो खाने-पीने की चीजों के दाम तेजी से बढ़ने लगते हैं। भारत में घरेलू खर्च का बड़ा हिस्सा खाने पर ही जाता है, इसलिए फूड इंफ्लेशन सीधे आम लोगों की जेब पर असर डालती है।

उधर कच्चा तेल हो रहा महंगा

इसी बीच मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव भी चिंता बढ़ा रहा है। यूएस-ईरान-इजराइल युद्ध ने ग्लोबल ऑयल मार्केट को हिला दिया है। कामथ ने इसे “बहुत बड़ी अव्यवस्था” बताया। उन्होंने कहा कि दुनिया के करीब 20 फीसदी तेल और LNG की सप्लाई होर्मुज के रास्ते से गुजरती है। अगर यहां लंबे समय तक तनाव बना रहा तो कच्चे तेल की कीमतों में और उछाल आ सकता है। भारत अपनी जरूरत का करीब 80 से 90 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। प्राकृतिक गैस के मामले में भी देश काफी हद तक आयात पर निर्भर है। ऐसे में तेल महंगा होने का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता। ट्रांसपोर्ट महंगा होता है, खाद की लागत बढ़ती है और कंपनियों का खर्च भी ऊपर चला जाता है।

कामथ के मुताबिक अप्रैल में भारतीय क्रूड बास्केट का औसत भाव 114 डॉलर प्रति बैरल और मई में करीब 106 डॉलर प्रति बैरल रहा। यह स्तर भारत के लिए सहज नहीं माना जाता। अर्थशास्त्री मानते हैं कि जब खाने-पीने की चीजें और ऊर्जा दोनों एक साथ महंगे होने लगें, तब केंद्रीय बैंक के सामने सबसे बड़ी चुनौती खड़ी होती है। ऐसे हालात में आर्थिक विकास की रफ्तार भी धीमी पड़ती है और महंगाई भी बढ़ती रहती है।

RBI बढ़ा सकता है ब्याज दरें

कामथ ने कहा कि अगर फूड और एनर्जी महंगाई एक साथ बढ़ती रही तो RBI ज्यादा समय तक चुप नहीं बैठ सकता। एक समय के बाद उसे ब्याज दरें बढ़ानी ही पड़ेंगी और वहीं से हालात संकट जैसे लगने लगते हैं। अगर ब्याज दरें बढ़ती हैं तो होम लोन, ऑटो लोन और बिजनेस लोन महंगे हो जाते हैं। इसका असर रियल एस्टेट, ऑटोमोबाइल और निवेश से जुड़े सेक्टरों पर पड़ता है। शेयर बाजार भी ऐसे समय में दबाव में आ सकता है, क्योंकि निवेशक महंगाई और वैश्विक तनाव को लेकर पहले से सतर्क हैं।