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अजमेर, Apr 05, 2026

पशु-पक्षियों का समझा दर्द, मूक जीवों की बनी आवाज

दशकों से पशु-पक्षियों की सेवा में समर्पित हैं मंजू शर्मा, कहती हैं - ये जीव हमसे पहले पृथ्वी के निवासी रहे, इसलिए उनका संरक्षण हमारा नैतिक दायित्व

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मंजू शर्मा

दिनेश कुमार शर्मा

अजमेर (Ajmer news) . सम्राट पृथ्वीराज चौहान राजकीय महाविद्यालय में सह आचार्य पद से सेवानिवृत्त डॉ. मंजू शर्मा का जीवन मानवीय संवेदनाओं की जीवंत मिसाल है। दिव्यांग होने के बावजूद उन्होंने अपने जीवन को मूक पशु-पक्षियों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। गाय, कुत्ता, बंदर, चिड़िया, गिलहरी और नंदी जैसे कई जीव उनके स्नेह और देखभाल पर निर्भर हैं। वे न केवल उन्हें भोजन उपलब्ध कराती हैं, बल्कि बीमार और घायल पशुओं का उपचार भी करवाती हैं। वे कहती हैं ‘पशु-पक्षी भी अपनेपन के भूखे होते हैं, उनमें भी संवेदनाएं होती हैं।’ उनका मानना है कि ये जीव हमसे पहले पृथ्वी के निवासी रहे हैं, इसलिए उनका संरक्षण हमारा नैतिक दायित्व है।

घायल श्वानों को घर लाकर उपचार करना दिनचर्या

उन्होंने सेंट मैरी कान्वेंट विद्यालय से स्कूली शिक्षा और सोफिया कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की। एमए पीएचडी तक शिक्षित डॉ. शर्मा ने 1987 से 1996 तक केन्द्रीय विद्यालय नसीराबाद और 1996 से 2023 तक एसपीसी-जीसीए में अध्यापन किया। वे पिछले 38 वर्षों से बेसहारा पशुओं की सेवा में जुटी हैं। उन्होंने बताया कि सात वर्ष की उम्र से ही उन्हें पशुओं से लगाव रहा। बाद में नौकरी के लिए नसीराबाद आने-जाने के दौरान हाइवे पर सड़क दुर्घटना में घायल होने वाले श्वानों को घर लाकर उनका उपचार करना उनकी दिनचर्या बन गया।

सेवानिवृत्ति के बाद भी सेवा

सेवानिवृत्ति के बाद भी वे रोज कॉलेज परिसर और आस-पास के क्षेत्रों में स्ट्रीट डॉग्स व नंदी को भोजन कराने जाती हैं। परिसर के 18 डॉग्स और उनके बच्चों सहित अनेक पशुओं की जिम्मेदारी उन्होंने अपने कंधों पर ले रखी है। उन्होंने बताया कि पूर्व में एक नंदी को कोई उनके घर के पास छोड़ गया। इसे दो साल तक घर पर रखा फिर नरवर से आगे भंवाल की गोपाल गोशाला पहुंचाया। इस गोशाला को उन्होंने गोद ले रखा है। इसे सर्वश्रेष्ठ गोशाला का पुरस्कार भी मिल चुका है। वे कहती हैं ‘पशुओं से नि:स्वार्थ भाव से अपनत्व मिलता है, यह उम्मीद इंसानों से करना कई बार बेमानी हो जाता है।’

पशु-पक्षी भी संवेदनशील, उन्हें भी जीने का अधिकार

पुष्कर में 2002 से 04 के बीच प्रोजेक्ट प्राइमेट्स चलाकर लंगूरों का उपचार कराया। लोगों को उन्हें गुलगुले आदि नहीं खिलाने के लिए जागरूक किया। वन विभाग के साथ उनके लिए रिजर्व एरिया बनवाया गया।पशुप्रेमियों व परिजन के साथ मिलकर वर्ष 2002 में वी-केयर संस्था की स्थापना की। इसका उद्देश्य लावारिस, वृद्ध व बीमार पशुओं की देखभाल व आश्रय प्रदान करना रहा। एक बार रीजनल कॉलेज के सामने बंदर किसी वाहन की चपेट में आकर घायल हो गया। उसका उपचार कराया। गिलहरी के मर जाने पर उसके बच्चों की देखभाल की। उनका मानना है कि पशु-पक्षी भी संवेदनशील हैं और उन्हें भी जीने का अधिकार है। उनका जीवन समाज को करुणा और सहअस्तित्व का संदेश देता है।

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